सोमवार, 5 अगस्त 2013

हनुमान मंदिर , कनॉट प्लेस , दिल्ली भाग 1.


दोस्तो आज आप सबसे साँझा करने जा रही हूँ सबसे बड़े दक्षिणमुखी  हनुमान मंदिर ,कनॉट प्लेस ,दिल्ली से जुडी कुछ स्मृतियाँ एवं इसके इतिहास के बारे में ,जहां कई वर्षों से लगातार जाना होता रहता है |
स्थिति :----
यह मंदिर बाबा खड़ग सिंह मार्ग पर स्थित है |दिल्ली मेट्रो के राजीव चौक स्टेशन से यह मात्र 500 मीटर की दूरी पर है यहां पहुँचने के लिए ब्लू लाइन या येलो लाइन का प्रयोग कर सकते हैं |वहां से खडक सिंह मार्ग वाले रास्ते से बाहर आकर आप पैदल ही आसानी से यहाँ पहुँच सकते हैं |इसके पास ही  बंगला साहिब गुरुद्वारा ,चर्च ,मस्जिद विराजमान हैं | 
परिचय :-----नई दिल्ली के हृदय कनॉट प्लेस में महाभारत कालीन श्री हनुमान जी का एक प्राचीन मंदिर है।यहाँ पर उपस्थित हनुमान जी स्वयंभू हैं। बालचन्द्र अंकित शिखर वाला यह मंदिर आस्था का महान केंद्र है।प्रत्येक मंगलवार एवं विशेषतः हनुमान जयंती के पावन पर्व पर यहां भजन संध्या और भंडारे लगाकर श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है। इसके साथ ही भागीरथी संस्था के तत्वाधान में संध्या का आयोजन किया जाता है, साथ ही क्षेत्र में झांकी निकाली जाती है।

हनुमान मंदिर कनॉट प्लेस 
               ज्यादातर यहाँ दोपहर में या रात में जाना हो पाता है पर एक बार यहाँ सुबह 5 बजे जाना हुआ ,जब मेरा जन्मदिन था और मंगलवार था तो सोचा वहां बहुत भिखारी बैठते हैं सुबह सुबह जो ज्यादातर अपाहिज होते हैं ,चलो आज उनको ही कुछ खिला कर अपना जन्मदिन मनाया जाए ,इसलिए मैंने उड़द की दाल बनाई और साथ में 10..12 ब्रेड लेकर वहां उनको वितिरित कर अपना जन्मदिन मनाया | सुबह सुबह की बेला और प्रभु भजनों का साथ हो तो वैसे ही आनंद दोगुना हो जाता है |
       इस मंदिर के प्रधान महंत मदनलाल शर्मा 'बाबाजी' के अनुसार  इतना बड़ा दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर पूरे वर्ल्ड में कहीं नहीं है। बाबाजी के अनुसार इस मंदिर की देखरेख में उनके परिवार की 34 पीढ़ियां सेवा में जुटी हैं। मंदिर में लोगों की सुविधा के लिए लगातार निर्माण किए गए हैं, जिससे इसकी सुंदरता और भव्यता लगातार बढ़ती रही है। उन्होंने कहा कि मंगलवार और शनिवार को इस मंदिर में श्रद्धालुओं की खासी भीड़ रहती है। इन दिनों इनकी संख्या बढ़कर 70 हजार तक पहुंच जाती है। हनुमान जयंती से जुड़े विशेष पर्व पर तो भक्तों की तादाद एक लाख से ऊपर पहुंच जाती है।
        अभी बीते शनिवार को यहाँ सुबह 6 बजे जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ | सूर्य धीरे धीरे अपना तेज बिखेरना शुरू हो रहा था, जब हम घर से निकले बहुत मुद्दतों बाद देखा कुछ लोग सैर करने जा रहे है  कुछ वापिसी पर हैं ,सब दुकानें बंद नजर आई सिर्फ खाने पीने की दुकानों पर हलचल शुरू हो चुकी थी ,सुबह की मस्त हवा का आनंद लेते हुए हम 25 मिनट में ही मंदिर पहुँच गए जहां पहुँचने में कम से कम 40 मिनट तो लगते ही हैं ,सुबह ऐसे लग रहा था दिल्ली में ट्रैफिक की समस्या का ऐसे ही बवाल होता है यहाँ तो कोई समस्या ही नहीं है | वैसे अगर हम मेट्रो से जाते हैं तो 40 मिनट मेट्रो में ,घर से मेट्रो तक और वहां से पैदल का समय मिलाकर लगभग 1 घंटा लग जाता है पर टू व्हीलर पर महज 1 घंटे में हम दर्शन कर वापिस भी आ गए |
इतिहास :-----
दिल्ली का ऐतिहासिक नाम इंद्रप्रस्थ शहर है, जो यमुना नदी के तट पर पांडवों द्वारा महाभारत-काल में बसाया गया था। तब पांडव इंद्रप्रस्थ पर और कौरव हस्तिनापुर पर राज्य करते थे। ये दोनों ही कुरु वंश से निकले थे। हिन्दू मान्यता के अनुसार पांडवों में द्वितीय भीम को हनुमान जी का भाई माना जाता है। दोनों ही वायु-पुत्र कहे जाते हैं। इंद्रप्रस्थ की स्थापना के समय पांडवों ने इस शहर में पांच हनुमान मंदिरों की स्थापना की थी। ये मंदिर उन्हीं पांच में से एक है।
चित्र:Idol of Baby Hanuman facing south in Connaught Place temple.JPG
बाल हनुमान की स्वयंभू प्रतिमा 
                  मान्यता अनुसार प्रसिद्ध भक्तिकालीन संत तुलसीदास जी ने दिल्ली यात्रा के समय इस मंदिर में भी दर्शन किये थे। तभी उन्होंने इस स्थल पर ही हनुमान चालीसा की रचना की थी। तभी मुगल सम्राट ने उन्हें अपने दरबार में कोई चमत्कार दिखाने का निवेदन किया। तब तुलसीदास जी ने हनुमान जी की कृपा से सम्राट को संतुष्ट किया। सम्राट ने प्रसन्न होकर इस मंदिर के शिखर पर इस्लामी चंद्रमा सहित किरीट कलश समर्पित किया। इस कारण ही अनेक मुस्लिम आक्रमणों के बावजूद किसी मुस्लिम आक्रमणकारी ने इस इस्लामी चंद्रमा के मान को रखते हुए कभी भी इस मंदिर पर हमला नहीं किया।
मंदिर की वेब साईट :----
मंदिर की वेबसाइट 16 अक्तूबर ,2010 में बनाई गई और इसका शुभ आरम्भ 17 अक्तूबर ,2010 को दशहरे वाले दिन किया गया इसके अनुसार इसका इतिहास ...
ऐतिहासिक संदर्भों के साथ-साथ इस मंदिर से सर्वधर्म समभाव और सांप्रदायिक एकता की कई मिसालें भी इस मंदिर के साथ जुड़ी हुई हैं. कहा जाता है कि मुगल बादशाह अकबर को जब काफी समय तक पुत्र प्राप्ति नहीं हुई तब वे कनाट प्लेस के इस मंदिर में आए और पूरी आस्था के साथ पुत्ररत्न की कामना की । और अंतत बजरंग बली की कृपा से सलीम के रूप में उनकी मुराद पूरी हुई. सौहार्द्र की मिसाल के तौर पर मंदिर के विमान पर आज भी ओम अथवा कलश के स्थान पर चांद का चिन्ह अवस्थित है. इस मंदिर की तमाम विशेषताओं में सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि ये हनुमानजी के बाल्यकाल को दर्शाने वाले देश का सबसे प्रमुख मंदिर है। यहां बाल हनुमान के एक हाथ में खिलौना और दूसरा हाथ उनके सीने पर है.  ये महावली वीरवर बजरंगबली का ही प्रताप है कि इस मंदिर में 1 अगस्त 1964 से आज तक लगातार श्री राम जयराम जय जय राम का जाप जारी है. जिसके लिए इसे गिनीज बुक में भी शामिल किया गया है।
चित्र:Crescent on Spire of Hanuman Temple, Connaught Place.JPG
शिखर पर चन्द्रमा सहित किरीट कलश 
वर्तमान इमारत आंबेर के महाराजा मान सिंह प्रथम (1540-1614) ने मुगल सम्राट अकबर के शासन काल में बनवायी थी। इसका विस्तार महाराजा जयसिंह द्वितीय (1688-1743) ने जंतर मंतर के साथ ही करवाया था। दोनों इमारतें निकट ही स्थित हैं। इसके बाद भी इमारत में समय समय पर कुछ कुछ सुधार, बदलाव आदि होते रहे। इस मंदिर का विशेष आकर्षण यहां होने वाले 24-घंटे का अटूट मंत्र जाप है। ये जाप "श्रीराम जय राम, जय जय राम॥" मंत्र का होता है, और यह 1अगस्त, 1964 से अनवरत चलता आ रहा है। बताया जाता है, कि ये विश्व का सबसे लंबा जाप है और इसकी रिकॉर्डिंग गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी अंकित है।[ लगभग 20 वर्ष से इससे जुड़ी हुई हूँ दो बार इस मंदिर का चलिया कर चुकी हूँ ,इसलिए जाप होते क्योंकि कभी दिखा नहीं है इसलिए इसकी पुष्टि हेतु वहां गद्दी पर बैठे महंत जी से इस जाप के बारे में पूछा तो उन्होंने इससे इन्कार किया कि ऐसा कोई जाप यहाँ नहीं होता है ]
प्रवेश द्वार :----
शिल्पकला की दृष्टि भी ये मंदिर बेहद उत्कृष्ट कोटि का है. इसके मुख्य द्वार का वास्तुशिल्प रामायण में वर्णित कला के अनुरूप है. मुख्य द्वार के स्तंभों पर संपूर्ण सुंदरकांड की चौपाइयां खुदी हुई हैं. ऐसा माना जाता है कि रामचरित मानस जैसा ऐतिहासिक धर्मग्रंथ लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदास 16वीं सदी में जब दिल्ली आए तब वे इस मंदिर में भी दर्शन को आए थे. कहा जाता है कि यही वो पवित्र स्थान है जहां से उन्हें 40 चौपाइयों की हनुमान चालीसा लिखने की प्रेरणा मिली |


मंदिर का प्रवेश द्वार 

मंदिर में प्रवेश करते ही सामने दिवार पर चारों तरफ हनुमान चालीसा संकटमोचन ,आरती और हनुमान एवं श्रीराम की प्रतिमाएं अंकित हैं बाये तरफ तुलसीदास जी की प्रतिमा लगाई गई है ,इसके साथ ही लक्ष्मी पूजन दरबार ,गणेश प्रतिमा भी स्थापित हैं।अब सरस्वती माँ और गायत्री माँ की मूर्ति भी स्थापित की गई है |प्रवेश करते ही सामने पंचमुखी हनुमान दरबार के साथ साथ संतोषी माँ की बहुत बड़ी प्रतिमा विराजमान है,जिसके आगे निरंतर ज्योति जलती रहती है यहाँ से परिक्रमा करते हुए पहुंचते हैं शिवालय में यहाँ शिव प्रतिमा के इलावा शिव पंचायत, साई बाबा की प्रतिमा विराजमान है यहाँ से बाहर आते ही मंदिर में एक समाधि है। महंत बाबाजी ने बताया कि यह समाधि महंत ध्यानचंद शर्मा की है, जिन्होंने वर्ष 1742 में यह समाधि ली थी।


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