रविवार, 8 सितंबर 2013

'' पर्यूषण ''

परिभाषा :---
पर्यूषण शब्द की परिभाषा व व्याख्या विभिन्न आचार्यों, साधु-साध्वियों ने विभिन्न विभिन्न रुप से की है। पर्यूषण शब्द का सन्धि-विच्छेद करते हुए परिउषण। परि का मतलब होता है चारों ओर से, सब तरफ से तथा उषण का अर्थ है दाह। जिस पर्व में कर्मों का दाह।विनाश किया जाये | 
पर्यूषण पर्व :---
पर्यूषण पर्व पर सामूहिक आराधना की जाती है। इन दिनों अध्यात्म मय माहौल देखने को मिलता है। इन दिनों में आध्यात्म पर प्रवचन, अध्यात्म का शिक्षण व अध्यात्म की साधना की प्रेरणा दी जाती है।
उद्देश्य :---
पर्यूषण पर्व को मनाने का मुख्य उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करने के लिए आवश्यक उपक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना होता है। पर्यावरण का शुद्धिकरण इसके लिए अनिवार्य बताया गया है।
पर्व समय:---
जैन धर्म में मुख्यतः दो सम्प्रदाय हैं- श्वेताम्बर संप्रदाय और दिगंबर संप्रदाय। श्वेताम्बर संप्रदाय को मानने वाले लोग पर्यूषण पर्व को भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की पंचमी तक मनाते हैं, जबकि दिगंबर संप्रदाय के लोग इस महापर्व को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी से चतुर्दशी तक मनाते हैं। पर्यूषण पर्व में अनुयायी जैन तीर्थंकरों की पूजा, सेवा और स्मरण करते हैं। पर्व में शामिल होने वाले लोग आठ दिनों के लिए उपवास रखने का प्रण करते हैं, इसे 'अटाई' या आष्टान्हिक पर्व भी कहा जाता है। आठ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में एक दिन स्वप्न दर्शन होता है, जिसमें उत्सव के साथ 'त्रिशाला देवी' की पूजा तथा आराधना आदि भी की जाती है|



आठ दिन का महत्व :---
जैन धर्म का यह प्रमुख पर्व पर्युषण महापर्व आठ दिनों का ही क्यों निर्धारित किया गया है ? तो उसका उत्तर है कि हमारी आत्मा के आठ प्रमाद है :-
1) अज्ञान, 2) संशय, 3) मिथ्या ज्ञान, 4) राग, 5) द्वेष, 6) स्मृति (स्मृति-भ्रंश), 7) धर्म-अनादर, 8) योग
दुष्परिणाम में फंसी हुई आठ मद :-
1) जाति, 2) कुल, 3) बल, 4) रुप, 5) तप, 6) लाभ, 7) श्रुत, 8) ऐश्वर्य
ऐश्वर्य के कारण 8 कर्म :- 1) ज्ञानावरणीय, 2) दर्शनावरणीय, 3) वेदनीय, 4) मोहनीय, 5) आयु, 6) नाम, 7) गौत्र, 8) अनाराम- से आवृत्त होकर अपनी सच्ची अलौकिक शक्ति तथा ज्ञान को खोती चली जा रही है। प्राचीन काल में 8 दिन के उत्सव होते थे तथा किसी भी शुभ कार्य में 8 का योग होना अच्छा मानते थे। मंगल आठ माने गए हैं। सिद्ध भगवान के भी 8 गुण बताए हैं। साधु की प्रवचन माता आठ है। संयम के भी आठ भेद बताए गए हैं।योग के 8 अंग हैं। आत्मा के रूचक प्रदेश भी आठ हैं। इस प्रकार आठ की गणना बड़ी महत्वपूर्ण रही है। 
क्षमापना :---
पर्यूषण पर्व पर क्षमापना या क्षमावाणी का कार्यक्रम ऐसा है जिससे जैनेतर जनता को काफी प्रेरणा मिलती है। इसे सामूहिक रूप से विश्व-मैत्री दिवस के रूप में मनाया जा सकता है। पर्यूषण पर्व के समापन पर इसे मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी या ऋषि पंचमी को संवत्सरी पर्व मनाया जाता है।

उस दिन लोग उपवास रखते हैं और स्वयं के पापों की आलोचना करते हुए भविष्य में उनसे बचने की प्रतिज्ञा करते हैं। इसके साथ ही वे चौरासी लाख योनियों में विचरण कर रहे, समस्त जीवों से क्षमा माँगते हुए यह सूचित करते हैं कि उनका किसी से कोई बैर नहीं है।


क्षमापना मंत्र

है प्रभु पार्श्वनाथ, है प्रभु भेरवनाथ, मेरे से रात दिन हज़ारो अपराध होते रहते है.

मैं आपका दास हुं यह समझकर कृपा पूर्वक क्षमा करो |

मैं आपका आवाह्न करना नहीं जानता विसर्जन करना नहीं जानता

पूजा करने का ढंग नहीं जानता, है प्रभु मुझे क्षमा करो

मंत्रहिन् क्रियाहीन तथा भक्तिहिन् जो पूजन किया है. वह आपकी कृपा से पूर्ण हो |

है प्रभु मैं अज्ञानी हु, अपराधी हु, मैं आपकी शरण मैं आ गया हु,

इसलिए दया का पात्र  हूँ , आगे जो आपको उचित लगे वैसा करे

भूल से, अज्ञान से, बुधिभांत होने का कारन कुछ न्यूनता या अधिकता हो गयी

हो तो क्षमा करो

और जल्दी प्रसन्न हो आपतो गोपनीय से गोपनीय वास्तु की रक्षा करने वाले हो,

मेरे निवेदन किये गए इस पाठ को स्वीकार करो,

आपकी कृपा से मेरी मनोकामना पूर्ण हो |
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यदि किसीने हमारा अपराध कर दिया हो और हम उसके बदले उसे दण्ड देने में समर्थ हों, फिर भी दण्ड न दे कर उसे छोड़ दें – क्षमा कर दें तो इससे दोनों को प्रसन्नता होगी – अपराधी को भी और अपराध्य को भी|
अपराधी को तो इसलिए प्रसन्नता होगी कि वह दण्ड से बच गया और अपराध्य (जिसका अपराध किया गया है, उस व्यक्ति) को इसलिए प्रसन्नता होगी कि अपराधी को क्षमा करके उसने अपराधी के हृदय में अपनी उदारता की छाप लगा दी है – अपराधी को अपना मित्र बना लिया है – उसे सुधार दिया है या सुधरने के लिए एक अवसर और दे दिया है|
शिक्षा :---
मानव की सोई हुई अन्त:चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व-धर्म समभाव के कथन को बल प्रदान करने के लिए पर्यूषण पर्व मनाया जाता है। यह पर्व धर्म के साथ राष्ट्रीय एकता तथा मानव धर्म का पाठ पढ़ाता है। यह पर्व सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना अनिवार्य है। भगवान भक्त की भक्ति को देखता है, उसकी अमीरी-गरीबी या सुख-समृद्धि को नहीं। जैन सम्प्रदाय का यह पर्व हर दृष्टीकोण से गर्व करने लायक़ है, क्योंकि इस दौरान गुरु भगवंतो के मुखारविद से अमृतवाणी का श्रवण होता है, जो हमारे जीवन में ज्ञान व धर्म के अंकुर को परिपक्व करता है।
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