बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

दीपावली

दीप जलाओ आप सब ,तम को कर दो दूर 
लक्ष्मी का है आगमन , हर द्वारे है नूर |
हमारा भारत त्योहारों का देश है ,यहाँ हर ऋतु के परिवर्तन के साथ  कोई ना कोई त्योहार जुड़ा हुआ है | इन त्योहारों के माध्यम से हम सब एक साथ मिलकर अपनी ख़ुशी को प्रकट करते हैं | भारत देश के प्रमुख त्योहार होली,रक्षाबंधन ,दशहरा और दीपावली हैं |इनमें से दीपावली सबसे प्रमुख त्योहार है |



         दीपावली अथवा दीवाली, प्रकाश उत्‍सव है, जो सत्‍य की जीत व आध्‍यात्मिक अज्ञान को दूर करने का प्रतीक है। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता रखता है। 
       शब्‍द "दीपावली" का शाब्दिक अर्थ है दीपों की पंक्तियां। यह हिंदू कलेन्‍डर का एक बहुत लोकप्रिय त्‍यौहार है। यह कार्तिक के 15वें दिन (अक्‍तूबर/नवम्‍बर) में मनाया जाता है।त्योहारों का जो वातावरण धनतेरस से प्रारम्भ होता है, वह आज के दिन पूरे चरम पर आता है। पांच-दिवसीय दीवाली अथवा दीपावली का पर्व, जिसका इतिहास दंतकथाओं से भरपूर है, तथा अधिकतर कथाएं हिन्दू पुराणों में मिल जाती हैं... लगभग प्रत्येक कथा का सार बुराई पर अच्छाई की जीत ही है | दीपावली की रात्रि को घरों तथा दुकानों पर भारी संख्या में दीपक, मोमबत्तियां और बल्ब जलाए जाते हैं।

दीपावली की तैयारियाँ :--
             कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता हैं। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा का सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं। यह त्‍यौहार नए वस्‍त्रों, दर्शनीय आतिशबाजी और परिवार व मित्रों के साथ विभिन्‍न प्रकार की मिठाइयों के साथ मनाया जाता है। चूंकि यह प्रकाश व आतिशबाजी, खुशी व आनन्‍दोत्‍सव दैव शक्तियों की बुराई पर विजय की सूचक है।

लक्ष्मी पूजन :--
दीपावली पर लक्ष्मीजी का पूजन घरों में ही नहीं, दुकानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में भी किया जाता है। कर्मचारियों को पूजन के बाद मिठाई, बर्तन और रुपये आदि भी दिए जाते हैं। दीपावली पर कहीं-कहीं जुआ भी खेला जाता है। इसका प्रधान लक्ष्य वर्ष भर के भाग्य की परीक्षा करना है।
इस प्रथा के साथ भगवान शंकर तथा पार्वती के जुआ खेलने के प्रसंग को भी जोड़ा जाता है, जिसमें भगवान शंकर पराजित हो गए थे। जहां तक धार्मिक दृष्टि का प्रश्न है, आज पूरे दिन व्रत रखना चाहिए और मध्यरात्रि में लक्ष्मी-पूजन के बाद ही भोजन करना चाहिए। जहां तक व्यवहारिकता का प्रश्न है, तीन देवी-देवों महालक्ष्मी, गणेशजी और सरस्वतीजी के संयुक्त पूजन के बावजूद इस पूजा में त्योहार का उल्लास ही अधिक रहता है। इस दिन प्रदोष काल में पूजन करके जो स्त्री-पुरुष भोजन करते हैं, उनके नेत्र वर्ष भर निर्मल रहते हैं। इसी रात को ऐन्द्रजालिक तथा अन्य तंत्र-मन्त्र वेत्ता श्मशान में मन्त्रों को जगाकर सुदृढ़ करते हैं। कार्तिक मास की अमावस्या के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर की तरंग पर सुख से सोते हैं और लक्ष्मी जी भी दैत्य भय से विमुख होकर कमल के उदर में सुख से सोती हैं। इसलिए मनुष्यों को सुख प्राप्ति का उत्सव विधिपूर्वक करना चाहिएं।

पूजन विधि :--
1.लक्ष्मी जी के पूजन के लिए घर की साफ-सफ़ाई करके दीवार को गेरू से पोतकर लक्ष्मी जी का चित्र बनाया जाता है। लक्ष्मीजी का चित्र भी लगाया जा सकता है।
2.संध्या के समय भोजन में स्वादिष्ट व्यंजन, केला, पापड़ तथा अनेक प्रकार की मिठाइयाँ होनी चाहिए। लक्ष्मी जी के चित्र के सामने एक चौकी रखकर उस पर मौली बांधनी चाहिए।
3.इस पर गणेश जी की व लक्ष्मी जी की मिट्टी या चांदी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए तथा उन्हें तिलक करना चाहिए। चौकी पर छ: चौमुखे व 26 छोटे दीपक रखने चाहिए और तेल-बत्ती डालकर जलाना चाहिए। फिर जल, मौली, चावल, फल, गुड़, अबीर, गुलाल, धूप आदि से विधिवत पूजन करना चाहिए।
4.पूजा पहले पुरुष करें, बाद में स्त्रियां। पूजन करने के बाद एक-एक दीपक घर के कोनों में जलाकर रखें। एक छोटा तथा एक चौमुखा दीपक रखकर लक्ष्मीजी का पूजन करें।
5.इस पूजन के पश्चात तिज़ोरी में गणेश जी तथा लक्ष्मी जी की मूर्ति रखकर विधिवत पूजा करें।
6.अपने व्यापार के स्थान पर बहीखातों की पूजा करें। इसके बाद जितनी श्रद्धा हो घर की बहू-बेटियों को रुपये दें।
7.लक्ष्मी पूजन रात के समय बारह बजे करना चाहिए।लेकिन आजकल मंदिर वगेरह में जो शुभ समय दिया जाता है उसी में पूजा करने का रिवाज है |
8.दुकान की गद्दी की भी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।
9.रात को बारह बजे दीपावली पूजन के बाद चूने या गेरू में रूई भिगोकर चक्की, चूल्हा, सिल-बट्टा तथा सूप पर तिलक करना चाहिए।
10.रात्रि की ब्रह्मबेला अर्थात प्रात:काल चार बजे उठकर स्त्रियां पुराने सूप में कूड़ा रखकर उसे दूर फेंकने के लिए ले जाती हैं तथा सूप पीटकर दरिद्रता भगाती हैं।
सूप पीटने का तात्पर्य है- 'आज से लक्ष्मीजी का वास हो गया। दुख दरिद्रता का सर्वनाश हो।' फिर घर आकर स्त्रियां कहती हैं- इस घर से दरिद्र चला गया है। हे लक्ष्मी जी! आप निर्भय होकर यहाँ निवास करिए।

आतिशबाजी की प्रथा :--
            दीपावली के दिन आतिशबाज़ी की प्रथा के पीछे सम्भवत: यह धारणा है कि दीपावली-अमावस्या से पितरों की रात आरम्भ होती है। कहीं वे मार्ग भटक न जाएं, इसलिए उनके लिए प्रकाश की व्यवस्था इस रूप में की जाती है। इस प्रथा का बंगाल में विशेष प्रचलन है।
आतिशबाजी में करोड़ों रूपये जलाकर राख कर दिए जाते हैं ,इसलिए हम सबको मिलकर इसका विरोध करना चाहिए |वोही धन किसी और सृजनात्मक कार्य में लगाना चाहिए |

दीपावली मनाने को लेकर प्रचलित कथायें एवं धारणायें :--
हर प्रांत या क्षेत्र में दीपावली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है | 

*सर्वाधिक प्रचलित कथा के अनुसार देश के उत्तरी भागों में दीपावली का पर्व भगवान श्री रामचंद्र द्वारा राक्षसराज रावण के वध के उपरान्त अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाता है... महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित धर्मग्रंथ रामायण में उल्लिखित कथा के अनुसार अयोध्या के राजकुमार राम अपनी विमाता कैकेयी की इच्छा तथा पिता दशरथ की आज्ञानुसार 14 वर्ष का वनवास काटकर तथा लंकानरेश रावण का वध कर इसी दिन पत्नी सीता, अनुज लक्ष्मण तथा भक्त हनुमान के साथ अयोध्या लौटे थे, तथा उनके स्वागत में पूरी नगरी को दीपों से सजाया गया था... उसी समय से दीपावली पर दिये जलाकर, पटाखे चलाकर, तथा मिठाइयां बांटकर इस शुभ दिन को मनाने की परम्परा शुरू हुई...

*एक अन्य मान्यता के अनुसार दीपावली के दिन ही माता लक्ष्मी दूध के सागर, जिसे 'केसरसागर' अथवा 'क्षीरसागर' भी कहा जाता है, से उत्पन्न हुई थीं... उत्पत्ति के उपरान्त मां लक्ष्मी ने सम्पूर्ण जगत के प्राणियों को सुख-समृद्धि का वरदान दिया, इसीलिए दीपावली पर माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है, तथा मान्यता है कि सम्पूर्ण श्रद्धा से पूजा करने से लक्ष्मी जी भक्तों पर प्रसन्न होकर उन्हें धन-सम्पदा तथा वैभव से परिपूर्ण करती हैं, तथा मनवांछित फल प्रदान करती हैं |

*इसी दिन उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राजतिलक हुआ था। विक्रम संवत का आरम्भ भी इसी दिन से माना जाता है। अत: यह नए वर्ष का प्रथम दिन भी है। आज ही के दिन व्यापारी अपने बही-खाते बदलते हैं तथा लाभ-हानि का ब्यौरा तैयार करते हैं।

*इसी दिन आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती का निर्वाण हुआ था।

*इस दिन भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बनाया था और इन्द्र ने स्वर्ग को सुरक्षित जानकर प्रसन्नतापूर्वक दीपावली मनाई थी।

*ग्रामीण क्षेत्रों में दीपावली को फसलों की कटाई के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है... आमतौर पर इस समय तक अनाज और अन्य फसलों की कटाई का काम पूरा होने के बाद किसानों के हाथ में धन भी आ चुका होता है, इसलिए उस धन को लक्ष्मी माता के चरणों में अर्पित कर त्योहार की खुशियां मनाई जाती हैं |

*दक्षिण में, दीपावली त्‍यौहार अक्‍सर नरकासुर, जो असम का एक शक्तिशाली राजा था, और जिसने हजारों निवासियों को कैद कर लिया था, पर विजय की स्‍मृति में मनाया जाता है। ये श्री कृष्‍ण ही थे, जिन्‍होंने अंत में नरकासुर का दमन किया व कैदियों को स्‍वतंत्रता दिलाई। इस घटना की स्‍मृति में प्रायद्वीपीय भारत के लोग सूर्योदय से पहले उठ जाते हैं, व कुमकुम अथवा हल्‍दी के तेल में मिलाकर नकली रक्‍त बनाते हैं। राक्षस के प्रतीक के रूप में एक कड़वे फल को अपने पैरों से कुचलकर वे विजयोल्‍लास के साथ रक्‍त को अपने मस्‍तक के अग्रभाग पर लगाते हैं। तब वे धर्म-विधि के साथ तैल स्‍नान करते हैं, स्‍वयं पर चन्‍दन का टीका लगाते हैं। मन्दिरों में पूजा अर्चना के बाद फलों व बहुत सी मिठाइयों के साथ बड़े पैमाने पर परिवार का जलपान होता है।

*एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था |

*जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही है।

* सिक्खों के लिए भी दीवाली महत्त्वपूर्ण हैक्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में 1577 ई. में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था।1619 ई. में दीवाली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था।

*नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है।

*पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय 'ओम' कहते हुए समाधि ले ली।

* दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने 40 गज ऊँचे बाँस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहाँगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे। मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में वे भाग लेते थे। शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लालकिले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।

दीपावली मनाने के लाभ व हानियाँ :--
लाभ :
. घरों की सॉफ सफाई और सफेदी की जाती है.
. इससे दोस्तों और रिश्तेदारों में भाईचारा बढ़ता है.
. सब छोटे बड़े इस दिन को हर्षोल्लास से मनाते हैं.
. बारिश के बाद जो कीड़े मकोडे पैदा होते हैं, उन्हे इस दिन सरसों के तेल को साड कर मारा जाता है और वातावरण को शुद्ध किया जाता है.
. प्रार्थना करने से अन्दरूनी शक्ति का विकास होता है|

नुकसान :
 . इस दिन चलाने वाले बॉम्ब या आतिशबाज़ियाँ जानलेवा भी हो सकती हैं, ख़ासकर बच्चों के लिए
. इस दिन कई लोग शराब पीते है और जुआ खेलते हैं |

हमारी भावी पीढ़ी नहीं जानती हम दीपावली क्यों मनाते हैं तो हम सबका दायित्व बनता है कि हम उनका मार्गदशन करें ताकि हमारे साथ वो भी अपनी परम्पराओं का सही मूल्यांकन कर सकें | इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हमारे किसी भी कार्य एवं व्यवहार से किसी को भी दुख न पहुंचे, तभी दीपावली का त्योहार मनाना सार्थक होगा।
                                शुभम्    शुभम्    शुभम् 

सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

नरक चतुर्दशी

दीपावली के पाँच दिनों के पर्व का दूसरा दिन, अर्थात् लक्ष्मीपूजा के एक दिन पहले वाला दिन, नरक चतुर्दशी कहलाता है।
नरक चतुर्दशी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को कहा जाता है। नरक चतुर्दशी को 'छोटी दीपावली' भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त इस चतुर्दशी को 'नरक चौदस', 'रूप चौदस', 'रूप चतुर्दशी', 'नर्क चतुर्दशी' या 'नरका पूजा' के नाम से भी जाना जाता है।

नर्क चतुर्दशी

यम देवता की पूजा का पर्व :-
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी के दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का भी पर्व है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन प्रातःकाल तेल लगाकर नीम की पत्तियाँ या कोई कड़वी पत्तियाँ जल में डालकर स्नान करने से नरक से मुक्ति मिलती है। विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो स्वर्ग को प्राप्त करते हैं।
             शाम को दीपदान की प्रथा है जिसे यमराज के लिए किया जाता है। दीपावली को एक दिन का पर्व कहना न्योचित नहीं होगा। इस पर्व का जो महत्व और महात्मय है उस दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण पर्व व हिन्दुओं का त्यौहार है। यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्यौहार है । दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस फिर नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली फिर दीपावली और गोवर्धन पूजा, भाईदूज।
छोटी दीपावली का पर्व :-
नरक चतुर्दशी जिसे छोटी दीपावली भी कहते हैं। इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले रात के वक्त उसी प्रकार दीए की रोशनी से रात के तिमिर को प्रकाश पुंज से दूर भगा दिया जाता है जैसे दीपावली की रात। 
इस रात दीए जलाने की प्रथा के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं हैं। 
१.
एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी दु्र्दान्त असुर नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। उन समस्त कन्याओं ने अपने मुक्तिदाता श्री कृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। नरकासुर का वध करने के कारण ही श्री कृष्ण को 'नरकारि' के नाम से भी जाना जाता है, 'नरकारि' शब्द नरक तथा अरि के मेल से बना हुआ है, नरक अर्थात नरकासुर और अरि का अर्थ है शत्रु। इसी उपलक्ष्य में नगरवासियों ने नगर को दीपों से प्रकाशित किया और उत्सव मनाया। तभी से नरक चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाने लगा।
२.
एक अन्य कथा यह है कि रन्ति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समझ यमदूत आ खड़े हुए। यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है। पुण्यात्मा राजा की अनुनय भरी वाणी सुनकर यमदूत ने कहा हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा लौट गया यह उसी पापकर्म का फल है।
         दूतों की इस प्रकार कहने पर राजा ने यमदूतों से कहा कि मैं आपसे विनती करता हूं कि मुझे वर्ष का और समय दे दे। यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचा और उन्हें सब वृतान्त कहकर उनसे पूछा कि कृपया इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय है। ऋषि बोले हे राजन् आप कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्रह्मणों को भोजन करवा कर उनसे अनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें।
राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया। इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है।

हनुमान उत्सव का पर्व :-
शास्त्रों में उल्लेख है कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मंगलवार की अर्द्घ रात्रि में देवी अंजनि के उदर से हनुमान जन्मे थे। देश के कई स्थानों में इस दिन को हनुमान जन्मोत्सव के रूप में भक्ति भाव से मनाया जाता है। 
                इस दिन वाल्मीकि रामायण व सुंदरकांड व हनुमान चालीसा का पाठ कर चूरमा, केला व अमरूद आदि फलों का प्रसाद वितरित किया जाता है। शास्त्रों में हनुमान की राम के प्रति अगाध श्रद्घा व भक्ति को बताया गया है। 
ऐसी ही एक कथा में यह प्रमाणित भी होता है। भगवान श्रीराम लंका पर विजय कर अयोध्या लौटे। जब हनुमान को अयोध्या से बिदाई दी गई तब माता सीता ने उन्हें बहुमूल्य रत्नों से युक्त माला भेंट में दी, पर हनुमान संतुष्ट नहीं हुए व बोले माता इसमें राम-नाम अंकित नहीं है। तब माता सीता ने अपने ललाट का सौभाग्य द्रव्य सिंदूर प्रदान कर कहा कि इससे बड़ी कोई वस्तु उनके पास नहीं है। 
हनुमान को सिंदूर देने के साथ ही माता सीता ने उन्हें अजर-अमर रहने का वरदान भी दिया। यही कारण है कि हनुमान जी को तेल व सिंदूर अति प्रिय है।

धनतेरस

धन त्रयोदशी :---
इस दिन धन की देवी लक्ष्मी ,धन्वन्तरी ,धन के देवता कुबेर और मृत्यु देवता यमराज की पूजा का विशेष महत्त्व है | लोक मान्यता के अनुसार धनतेरस एक धन लगाकर तेरह गुणा धन पाने का त्योहार है। इसलिए अमीर गरीब हर वर्ग के व्यक्ति इस दिन कुछ न कुछ खरीदते हैं। 

लेकिन शास्त्रों के अनुसार धनतेरस के मौके पर लाभ वृद्घि के लिए शुभ मुहूर्त में ही खरीदारी करनी चाहिए। हर दिन कुछ समय ऐसे होते हैं जब खरीदारी या कोई भी शुभ काम करना अच्छा नहीं होता है। इसलिए इस समय का ध्यान रखकर ही धनतेरस पर खरीदारी करें।

धनतेरस

जिस प्रकार देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार भगवान धनवन्तरि भी अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए हैं। देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण है दीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें।


कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। धन्वन्तरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरी चूँकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। कहीं कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन [धातु] खरीदने से उसमें 13 गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर धनिया के बीज खरीद कर भी लोग घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।
रीति रिवाज :---
धनतेरस के दिन चांदी खरीदने की भी प्रथा है। अगर सम्भव न हो तो कोई बर्तन खरीदें। इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है। संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह स्वस्थ है सुखी है और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरी जो चिकित्सा के देवता भी हैं उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हें। यह दिन व्यापारियोँ के लिए विशेष महत्त्व रखता है |

प्रचलित लोक कथा:--
धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोक कथा है, कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। |ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया।

विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा परंतु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे उसी वक्त उनमें से एक ने यमदेवता से विनती की हे यमराज क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु के लेख से मुक्त हो जाए। दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यमदेवता बोले हे दूत अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूं सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।

धन्वंतरि:---
धन्वन्तरि देवताओं के वैद्य हैं और चिकित्सा के देवता माने जाते हैं इसलिए चिकित्सकों के लिए धनतेरस का दिन बहुत ही महत्व पूर्ण होता है। धनतेरस के संदर्भ में एक लोक कथा प्रचलित है कि एक बार यमराज ने यमदूतों से पूछा कि प्राणियों को मृत्यु की गोद में सुलाते समय तुम्हारे मन में कभी दया का भाव नहीं आता क्या। दूतों ने यमदेवता के भय से पहले तो कहा कि वह अपना कर्तव्य निभाते है और उनकी आज्ञा का पालन करते हैं परंतु जब यमदेवता ने दूतों के मन का भय दूर कर दिया तो उन्होंने कहा कि एक बार राजा हेमा के ब्रह्मचारी पुत्र का प्राण लेते समय उसकी नवविवाहिता पत्नी का विलाप सुनकर हमारा हृदय भी पसीज गया लेकिन विधि के विधान के अनुसार हम चाह कर भी कुछ न कर सके।

एक दूत ने बातों ही बातों में तब यमराज से प्रश्न किया कि अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय है क्या। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यम देवता ने कहा कि जो प्राणी धनतेरस की शाम यम के नाम पर दक्षिण दिशा में दीया जलाकर रखता है उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती है। इस मान्यता के अनुसार धनतेरस की शाम लोग आँगन मे यम देवता के नाम पर दीप जलाकर रखते हैं। इस दिन लोग यम देवता के नाम पर व्रत भी रखते हैं।

धनतेरस के दिन दीप जलाककर भगवान धन्वन्तरि की पूजा करें। भगवान धन्वन्तरी से स्वास्थ और सेहतमंद बनाये रखने हेतु प्रार्थना करें। चांदी का कोई बर्तन या लक्ष्मी गणेश अंकित चांदी का सिक्का खरीदें। नया बर्तन खरीदे जिसमें दीपावली की रात भगवान श्री गणेश व देवी लक्ष्मी के लिए भोग चढ़ाएं।

आर्थिक तंगी से बचने के कुछ विशेष उपाय :---
आज हम आपको बताने जा रहे हैं ऐसे ही कुछ छोटे-छोटे उपाय जिनके बारे में ये मान्यता है कि इन्हें धनतेरस के दिन किसी भी शुभ समय में किया जाए तो घर में स्थिर लक्ष्मी का निवास होता है। 

मोर की मिट्टी- 
धनतेरस पर यदि पूजा के समय किसी ऐसे स्थान की मिट्टी जहां मोर नाचा हो लाकर और पूजा करें। इस मिट्टी को लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रखने से घर पर हमेशा लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी।

गाय का भोजन जरूर निकालें- 
धनतेरस और दीपावली के दिन रसोई में जो भी भोजन बना हो, सर्वप्रथम उसमें से गाय के लिए कुछ भाग अलग कर दें। ऐसा करने से घर में स्थिर लक्ष्मी का निवास होगा।

ऐसे पेड़ की टहनी रखना है शुभ-
धनतेरस के दिन किसी भी शुभ समय में किसी ऐसे पेड़ की टहनी तोड़ कर लाएं, जिस पर चमगादड़ रहते हों। इसे अपने बैठने की जगह के पास रखें, लाभ होगा।

मंदिर में लगाएं केले के पौधे- 
धनतेरस के दिन किसी भी मंदिर में केले के दो पौधे लगाएं। इन पौधों की समय-समय पर देखभाल करते रहें। इनके बगल में कोई सुगंधित फूल का पौधा लगाएं। केले का पौधा जैसे-जैसे बड़ा होगा, आपके आर्थिक लाभ की राह प्रशस्त होगी।

दक्षिणावर्ती शंख में लक्ष्मी मंत्र का जप-
धनतेरस के दिन लक्ष्मी पूजन के बाद दक्षिणावर्ती शंख में लक्ष्मी मंत्र का जप करते हुए चावल के दाने व लाल गुलाब की पंखुड़ियां डालें। ऐसा करने से समृद्धि का योग बनेगा।
मंत्र- श्रीं

लक्ष्मी को अर्पित करें लौंग- 
धनतेरस के दिन लक्ष्मी पूजन के बाद लक्ष्मी या किसी भी देवी को लौंग अर्पित करें। यह काम दीपावली के दिनों में रोज करें। आर्थिक लाभ होता रहेगा।

लघु नारियल का उपाय- 
धनतेरस पर पूजा के समय धन, वैभव व समृद्धि पाने के लिए 5 लघु नारियल पूजा के स्थान पर रखें। उन पर केसर का तिलक करें और हर नारियल पर तिलक करते समय 27 बार नीचे लिखे मंत्र का मन ही मन जप करते रहें-
                  ऐं ह्लीं श्रीं क्लीं
धनतेरस पर ये आसान उपाय करने से, दूर हो सकती है आर्थिक तंगी
- 11 लघु नारियल को मां लक्ष्मी के चरणों में रखकर ऊं महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नीं च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् मंत्र की 2 माला का जप करें। किसी लाल कपड़े में उन लघु नारियल को लपेट कर तिजोरी में रख दें व दीपावली के दूसरे दिन किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें। ऐसा करने से लक्ष्मी चिरकाल तक घर में निवास करती है।

-  यदि आप चाहते हैं कि घर में कभी धन-धान्य की कमी न रहे और अन्न का भंडार भरा रहे तो 11 लघु नारियल एक पीले कपड़े में बांधकर रसोई घर के पूर्वी कोने में बांध दें।

किन्नर को धन करें दान- 
धनतेरस के दिन किसी किन्नर को धन दान करें और उसमें से कुछ रुपए वापस अनुरोध करके प्राप्त कर लें। इन रुपयों को सफेद कपड़े में लपेटकर कैश तिजोरी में रख लें, लाभ होगा।

सफेद चीजों का करें दान- 
धनतेरस पर सफेद पदार्थों जैसे चावल, कपड़े, आटा आदि का दान करने से आर्थिक लाभ का योग बनता है।

सूर्यास्त के बाद न करें झाड़ू-पोंछा- 
दीपावली के दिनों में और हो सके तो रोज ही शाम को सूर्यास्त के बाद घर में झाड़ू-पोंछा न करें। ऐसा करने से घर में लक्ष्मी चली जाती है।

गरीब की आर्थिक सहायता करें- 
धनतेरस पर किसी गरीब, दुखी, असहाय रोगी को आर्थिक सहायता दें। ऐसा करने से आपकी उन्नति होगी।

हथेलियों के दर्शन हैं शुभ-
प्रातःकाल उठकर सर्वप्रथम अपनी हथेलियों के दर्शन की आदत डालें। यह एक शुभ क्रिया है। इसे करने से आपको शुभ ऊर्जा प्राप्त होगी।

बुधवार, 27 अगस्त 2014

शिमला यात्रा वृतांत भाग 3.

भाग 2.
चौथा दिन 
       सुबह लगभग 9.30 बजे हम सब कुछ हल्का फुल्का नाश्ता लेकर होटल छोड़ कर निकल गए | हमने अपना सामान वहीँ छोड़ दिया था ,बाद में ले जाने के लिए | हमारी कालका से शाम 5.40 की गाड़ी थी और अभी हमें वापिस जाने के लिए टैक्सी करनी थी इसलिए हमने जो टैक्सी वाले घूम रहे थे रिज पर उनसे पूछना शुरू किया और एक से बात हो गई कि वो एक बजे हमारे पास पहुँच जायेगा तो इसके बाद हमने खाना खाने की और थोड़ा तिब्बती बाजार घूमने की सोची | हम वहां से जल्दी वापिस आ गए और पता चला टैक्सी वाले को अभी देर लगने वाली थी इसलिए हमने दूसरी टैक्सी लेने की सोची | दो लोग होटल से सामान लेने चले गए | और भूषण जी टैक्सी का पता करने लगे | तिब्बती बाजार के नीचे की तरफ जो टैक्सी स्टैंड था वहां कोई टैक्सी मिल नहीं रही थी,फिर दूसरे टैक्सी स्टैंड से बहुत मुश्किल से हमें 2 बजे तक एक टैक्सी मिल पाई ,जो कालका हमें छोड़ने के लिए तैयार हुई | आखिर हम सबने टैक्सी में बैठकर चैन की साँस ली |
               टैक्सी लगभग 3 से 3.30 घंटे में शिमला से कालका पहुंचा देती है | 2000 रुपये से लेकर 2,500 रुपये तक में बड़ी टैक्सी मिल जाती है हमें सही ड्राईवर और टैक्सी मिल गई थी उसने हमें 3..4 किलोमीटर पहले एक और टैक्सी में शिफ्ट कर दिया ,क्योंकि उसके बाद वो टैक्सी आगे नहीं जा सकती थी शायद कुछ टैक्स का चक्कर था | लगभग 3 घंटे में टैक्सी ने कालका स्टेशन पर पहुँचा दिया था | 
        हम सब वहां गाड़ी का इंतजार करने लगे और तय समय पर गाड़ी आ गई और हम उसमे सवार हो गए | वोही शताब्दी गाड़ी जिसके चलते ही पहले चाय आ जाती है ,फिर 8 बजे खाना बंटना शुरू हो चूका था और आइस क्रीम | लेकिन इतनी जल्दी सब खाना खाने को तैयार नहीं थे इसलिए उन्होंने खाना वापिस भिजवा दिया ,लेकिन वो खाना पैक करके भी दे रहे थे जो ले जाना चाहे अपना खाना | हम 10.15 बजे तक दिल्ली पहुँच गए थे | वहां से हमने मेट्रो ली और 11 बजे तक घर पहुँच गए |
              आइये अब जाने शिमला के बारे में कुछ और ज्यादा यहाँ हम नहीं जा पाये .....
शिमला की खासियत :-

संस्कृति
शिमला में विभिन्न त्योहारों को मनाया जाता है। शिमला समर फेस्टिवल, पीक पर्यटन सीजन के दौरान हर साल रिज पर आयोजित किया जाता है। इसका मुख्य आकर्षण सभी देश भर से लोकप्रिय गायकों द्वारा प्रदर्शन शामिल है।

कृषि और उद्योग
शिमला एक कृषि बाज़ार है और यहाँ मद्यनिर्माण, हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग जैसे लघु उद्योग हैं।

शिक्षा
शिमला में अनेक पुराने आरोग्यगृह, महाविद्यालय और हिमालय प्रदेश विश्वविद्यालय भी है।
1972-73 में पुनर्गठन के समय शिमला ज़िले (5,000 वर्ग किमी) का विस्तार किया गया था।
शिमला में 14 आंगनबाड़ी और 63 प्राथमिक विद्यालय है। कई ब्रिटिश युग के स्कूल भी हैं।
शिमला में लोकप्रिय स्कूलों में बिशप कॉटन स्कूल, शिमला पब्लिक स्कूल, सेंट एडवर्ड स्कूल, तारा हॉल, डीएवी स्कूल, डीएवी न्यू शिमला, दयानंद पब्लिक स्कूल, ऑकलैंड स्कूल, लालपानी स्कूल प्रमुख हैं।
केन्द्रीय विद्यालय, शिमला के बेहतरीन स्कूलों में से एक है। पहले यह हरकोर्ट बटलर स्कूल के नाम से जाना जाता था।

शिमला में मेडिकल संस्थानों में इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज और दंत चिकित्सा महाविद्यालय हैं।

दर्शनीय स्थल :---
शिमला में और उसके आसपास बहुत सारे दर्शनीय स्थल हैं ,जिनका आप पूरा आनंद सर्दिओं में ले सकते हैं |

रिज
शहर के मध्य में एक बड़ा और खुला स्थान, जहां से पर्वत श्रंखलाओं का सुंदर दृश्य देखा जा सकता है। यहां शिमला की पहचान बन चुका न्यू-गॉथिक वास्तुकला का उदाहरण क्राइस्ट चर्च और न्यू-ट्यूडर पुस्तकालय का भवन दर्शनीय है।

मॉल
शिमला का मुख्य शॉपिंग सेंटर, जहां रेस्तरां भी हैं। गेयटी थियेटर, जो पुराने ब्रिटिश थियेटर का ही रूप है, अब सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र है। कार्ट रोड से मॉल के लिए हि.प्र.प.वि.नि. की लिफ्ट से भी जाया जा सकता है। रिज के समीप स्थित लक्कड़ बाजार, लकड़ी से बनी वस्तुओं और स्मृति-चिह्नों के लिए प्रसिद्ध है।

काली बाड़ी मंदिर
यह मंदिर स्कैंडल प्वाइंट से जनरल पोस्ट ऑफिस से की ओर कुछ गज की दूरी पर स्थित है। माना जाता है कि यहां श्यामला देवी की मूर्ति स्थापित है।


शिमला तस्वीरें - काली बारी मंदिर - मंदिर का दृश्य


जाखू मंदिर
(2.5 कि.मी.) 2455 मी. : शिमला की सबसे ऊंची चोटी से शहर का सुंदर नजारा देखा जा सकता है। यहां "भगवान हनुमान" का प्राचीन मंदिर है। 
कैसे पहुँचें 
रिज पर बने चर्च के पास से पैदल मार्ग के अलावा मंदिर तक जाने के लिए पोनी या टैक्सी द्वारा भी पहुंचा जा सकता है।



जाखू मन्दिर ..यहाँ हनुमान जी की विशालकाय प्रतिमा 108 ऊँची स्थापित है हनुमान जी का यह विरत रूप देखते ही बनता है | 
मान्यता
पौराणिक कथा के अनुसार राम तथा रावण के मध्य हुए युद्ध के दौरान मेघनाद के तीर से भगवान राम के अनुज लक्ष्मण घायल एवं मूर्छित हो गए थे। उस समय सब उपचार निष्फल हो जाने के कारण वैद्यराज सुषेण ने कहा कि अब एक ही उपाय शेष बचा है। हिमालय की संजीवनी बूटी से लक्ष्मण की जान बचायी जा सकती है। इस संकट की घड़ी में रामभक्त हनुमान ने कहा प्रभु मैं संजीवनी लेकर आता हूँ। हनुमानजी हिमालय की और उड़े, रास्ते में उन्होंने नीचे पहाड़ी पर 'याकू' नामक ऋषि को देखा तो वे नीचे पहाड़ी पर उतरे। जिस समय हनुमान पहाड़ी पर उतरे, उस समय पहाड़ी उनका भार सहन न कर सकी। परिणाम स्वरूप पहाड़ी जमीन में धंस गई। मूल पहाड़ी आधी से ज्यादा धरती में समा गई। इस पहाड़ी का नाम 'जाखू' है। यह 'जाखू' नाम ऋषि याकू के नाम पर पड़ा था।

हनुमान ने ऋषि को नमन कर संजीवनी बूटी के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की तथा ऋषि को वचन दिया कि संजीवनी लेकर आते समय ऋषि के आश्रम पर जरूर आएंगे। हनुमान ने रास्ते में 'कालनेमी' नामक राक्षस द्वारा रास्ता रोकने पर युद्ध करके उसे परास्त किया। इस दौड़धूप तथा समयाभाव के कारण हनुमान ऋषि के आश्रम नहीं जा सके। हनुमान याकू ऋषि को नाराज नहीं करना चाहते थे, इस कारण अचानक प्रकट होकर और अपना विग्रह बनाकर अलोप हो गए। ऋषि याकू ने हनुमान की स्मृति में मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर में जहां हनुमानजी ने अपने चरण रखे थे, उन चरणों को संगमरमर पत्थर से बनवाकर रखा गया है। ऋषि ने वरदान दिया कि बंदरों के देवता हनुमान जब तक यह पहाड़ी है, लोगों द्वारा पूजे जाएंगे।



चैल 
चैल कभी पटियाला के महाराजा की गर्मियों की राजधानी होती थी। यह शिमला से 43 किमी दूर है। यहां विश्व में सबसे ऊंचाई पर स्थित क्रिकेट पिच और पोलो ग्राउंड भी है।
यह जगह लोगों में पिकनिक स्पॉट के रूप में भी काफी लोकप्रिय है। छुट्टी मनाने के लिए आने वाले लोगों के बीच में चैल सेंचुरी काफी प्रसिद्ध है। यहां आप कई जंगली पशुओं को देख सकते हैं। सिद्ध बाबा का मंदिर लोगों के आकर्षण का केंद्र है।

कैसे पहुंचें: चैल तक बस या टैक्सी के जरिए पहुंचा जा सकता है।

कहां ठहरें: चैल में ठहरने का खर्च शिमला में ठहरने की अपेक्षा काफी कम खर्च आएगा। यहां फाइव स्टार होटल तो नहीं मिलेंगे, लेकिन यहां कई अच्छे और सस्ते होटल अवश्य उपलब्ध हैं। यहां आप चार हजार रुपए में आराम से रह सकते हैं।

नारकंडा
यह शिमला से 64 किमी दूर है। यह जगह गर्मियों में अपने एडवेंचर और ट्रैकिंग के लिए प्रसिद्ध है। नारकंडा में आप फलों के बगीचे देख सकते हैं। सेब के बगीचे आपको यहां हर जगह मिलेंगे।
कैसे पहुंचे : नारकंडा शिमला से बस या फिर टैक्सी के जरिए पहुंचा सकता है।

राज्य संग्रहालय
(3 कि.मी.): यहां हिमाचल प्रदेश की प्राचीन ऐतिहासिक वास्तुकला और पेंटिंग्स देखे जा सकते हैं। यह संग्रहालय प्रात: 10 बजे से सायं 5 बजे तक खुलता है तथा सोमवार और राजपत्रित अवकाशों में यह बंद रखा जाता है।

इंडियन इंस्टीट्यूट आफ एडवांस्ड स्टडी
(4 कि.मी.) 1983 मी. : अंग्रेजी पुनर्जागरण काल में बना यह शानदार भवन पूर्व वायसराय का आवास हुआ करता था। इसके लॉन और पेड़ यहां की शोभा और बढ़ा देते हैं।


Shimla photos, Viceregal Lodge & Botanical Gardens - A lower angled view

प्रोस्पेक्ट हिल
(5 कि.मी.) 2155 मी. : कामना देवी मंदिर को समर्पित यह हिल शिमला-बिलासपुर मार्ग पर बालुगंज से 15 मिनट की पैदल दूरी पर है। हिल से इस क्षेत्र का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।

समर हिल
(7 कि.मी.) 1983 मी. : शिमला-कालका रेलमार्ग पर एक सुंदर स्थान है। यहां के शांत वातावरण में पेड़ों से घिरे रास्ते हैं। अपनी शिमला यात्रा के दौरान राष्ट्पिता महात्मा गांधी राजकुमारी अमृत कौर के शानदार जार्जियन हाउस में रुके थे। यहां हिमाचल प्रदेश विश्वद्यालय है।

चैडविक जलप्रपात
(7 कि.मी.) 1586 मी. : घने जंगलों से घिरा यह स्थान समर हिल चौक से लगभग 45 मिनट की पैदल दूरी पर है।

संकट मोचन
(7 कि.मी.) 1975 मी. : शिमला-कालका सड़क मार्ग पर (रा.राज.-22) पर "भगवान हनुमान" का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां से शिमला शहर का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। यहां बस/टैक्सी द्वारा पहुंचा जा सकता है।


Shimla photos, Sankat Mochan Temple - Idol of Hanumanji

तारादेवी

(11 कि.मी.) 1851 मी. : शिमला-कालका सड़क मार्ग पर (रा.राज.-22) पर यह पवित्र स्थान के लिए रेल, बस और कार सेवा उपलब्ध है। स्टेशन/सड़क से पैदल अथवा जीप/टैक्सी द्वारा यहां पहुंचा जा सकता है।


Shimla photos, Tara Devi Temple - Tara Devi Temple

नालदेहरा 

नालदेहरा शिमला-तत्तपानी रोड पर शिमला से करीब 25 किमी दूर 6,706 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। देश का सबसे पुराना और सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित गोल्फ कोर्स यही है। यह प्रसिद्ध पिकनिक स्पॉट है। इसके अलावा यह जंगल यात्रा और हॉर्स राइडिग के लिए भी जाना जाता है।

कैसे पहुंचें : नालदेहरा शिमला से 25 किमी दूर स्थित है। यहां आप शिमला से बस या फिर टैक्सी द्वारा पहुंच सकते हैं।


कहां ठहरें : नालदेहरा शिमला से ज्यादा दूर नहीं है। यहां आपको फाइव स्टार होटल तो नहीं मिलेंगे लेकिन छोटे-छोटे होटल यहां जरूर उपलब्ध हैं, जहां आप ठहर सकते हैं।


नालदेहरा तस्वीरें,नालदेहरा गोल्फ कोर्स

कुफरी 
कुफरी, 2743 मीटर की ऊंचाई पर स्थित, शिमला से लगभग 18 किमी की दूरी पर एक छोटा सा शहर है। इस जगह का नाम 'कुफ्र' शब्द से पड़ा है, जिसका स्थानीय भाषा में मतलब है 'झील'। इस जगह के साथ जुड़े आकर्षण के कारण यहाँ वर्ष भर पर्यटक आते हैं। महासू पीक, ग्रेट हिमालयन नेचर पार्क, और फागू कुफरी में कुछ प्रमुख पर्यटन स्थलों में से हैं।


ग्रेट हिमालयन नेचर पार्क पक्षियों और जानवरों की 180 से अधिक प्रजातियों का घर है। फागू , कुफरी से 6 किमी दूरी पर स्थित, शांति प्रेमियों के बीच एक लोकप्रिय गंतव्य है। सुरम्य पर्वत श्रृंखला से घिरा हुआ है, यह गंतव्य एक लोकप्रिय धार्मिक स्थल भी है।
आसपास के कुछ मंदिर अपनी लकड़ी की नक्काशी के लिए जाने जाते रहे हैं। यह जगह लंबी पैदल यात्रा, शिविर और ट्रैकिंग जैसे विभिन्न साहसिक गतिविधियों के लिए भी लोकप्रिय है। कुफरी में अपने प्रवास के दौरान साहसिक उत्साही स्कीइंग, टोबोगैनिंग, गो–कार्टिंग, और घोड़े की सवारी की तरह विभिन्न खेलों का आनंद ले सकते हैं।

कुछ सावधानियां :--
1.पहाड़ी स्थान पर जाने के लिए काफी चलने के लिए जो सक्षम हो वोही शिमला यात्रा का आनंद उठा सकता है | 
2.टॉय ट्रेन में कभी भी नहीं जाएँ ,अगर जरुरी हो तो कुछ खाने का सामान लेकर चलें |
3.जाखू मंदिर जाएँ तो कोई भी पर्स बैग वगेरह ना लेकर जाएँ पर छड़ी ले जाना नहीं भूलें |
4.कुफरी गर्मी या बरसात में कभी नहीं जाएँ जब तक वहां का प्रशासन वहां के रास्ते की सुध नहीं लेता | इसे नेट पर ही निहारें बहुत खूबसूरत लगेगा वर्ना दूर के ढोल सुहावने होते हैं यह जान लें | यहाँ केवल सर्दियों में ही जाएँ तो आपको प्रकृति की गोद का अहसास होगा |
5.मौसम के अनुसार गर्म कपड़े लेकर जाएँ |
6.दर्शनीय स्थल सर्दी में ही देखने जायें ,गर्मी में मौसम का आनंद लें बस,आसपास घुमने नहीं जाएँ |
7.होटल बेशुमार हैं शिमला में ,नेट से थोडा अंदाजा लेकर जाएँ | होटल मॉल रोड या रिज पर लें तो बेहतर रहेगा |
8.अगर ऑफ़ सीजन में जाएँ तो कम पैसों में दोगुना मजा ले सकते हैं |
9.अपनी जरुरी दवाइयाँ लेकर जाएँ ,मिल तो सब कुछ जाता है अगर आप बार बार चल सकते हैं तो |
10.यह प्राकृतिक सम्पदा आपकी अपनी है इसे स्वच्छ रखें |




अलविदा दोस्तों मिलते हैं बहुत जल्दी एक और यात्रा वृतांत के साथ तब तक के लिए मस्त रहें और व्यस्त रहें ....नमस्कार ...

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

शिमला यात्रा वृतांत भाग 2.

दूसरा दिन :--
दूसरे दिन सब आराम से उठकर तैयार हुए , खूब बरसात होने लगी थी इसलिए होटल में ही थोडा नाश्ता ले लिया ,वैसे तो शिमला के आसपास घूमने जाने का प्रोग्राम था लेकिन बारिश के कारण 12 बज चुके थे ,इसलिए सब ने यहीं शिमला में ही घूमने का फैसला किया यहाँ तीन रोड लगभग समान्तर चलती हैं सबसे ऊपर रिज रोड ,फिर नीचे माल रोड और उसके नीचे है नीचा बाजार रोड है |   रिज रोड पर लायब्रेरी है और कुछ होटल हैं ,माल रोड पर थाना , नगर निगम दफ्तर है ,फायर स्टेशन है और बहुत सारे होटल ढाबे , दुकानें हैं यह एक खुला बाजार है | 





इसके ठीक नीचे छोटा बाजार है जो दिल्ली के चांदनी चौंक की तरह तंग बाजार है और ये दुकानों से पटा हुआ है ,यहाँ बाकी दुकानों के इलावा कपडे की,जूतों की और किताबों की बहुत दुकानें हैं ,शौपिंग के लिए यह एक परफेक्ट बाजार है |  
यहाँ शॉपिंग करने के बाद और खाना वगेरह खाने के बाद हम घूमते हुए वापिस होटल पहुँच गए | आराम करने के बाद शाम ढलने के साथ ही हम वापिस पहुंचे चौंक पर यहाँ बिलकुल इंडिया गेट जैसा माहौल रहता है काफी चहल पहल थी बच्चे घुड़सवारी का मजा ले रहे थे ,धुंध धीरे धीरे बढ़ने लगी और मौसम सुहावना होता गया , सब लोग वहां मौसम का मजा ले रहे थे | कोई फोटो के पोज़ ले रहा था कोई कुछ खाने का मजा ले रहे थे | वहां लकड़ी से बने बेंच लगे हुए हैं ,यहाँ जब कोई प्रोग्राम वगेरह होता है तो सब इन पर बैठ सकते हैं | ऐसे ही घूमते फिरते ,खाते पीते सब ने खूब मजे किये | 

         इसके ठीक पीछे की तरफ है लक्कड़ बाजार ,यहाँ लकड़ी से बना हुआ सामान मिलता है खासकर यह बाजार स्मृति चिन्हों के लिए प्रसिद्ध है यहाँ से आप शिमला के उपहार खरीद कर ले जा सकते हैं भेंट स्वरुप देने के लिए | कुछ कपड़े की भी यहाँ दुकानें हैं शिमला में ज्यादा दुकानें सरदार चलाते हैं क्योंकि यह चंडीगढ़ के पास है |
            हम लोग खरीदारी करके फिर वापिस होटल पहुँच गए और थोड़ा आराम करने के बाद रात को वापिस निकले भोजन करने के लिए ,यहाँ पर आपके लिए बहुत सारे आप्शन हैं जो खाना चाहें ,जैसा खाना खाना चाहें,एक तरफ ढाबे का खाना है तो एक तरफ अच्छे अच्छे रेसटोरेंट भी हैं ,सागर रत्ना भी यहाँ मौजूद है | बालूजी में खाना खाने के बाद हम वापिस होटल आ गए | 
तीसरा दिन :--
आज मौसम बहुत साफ़ था कोई बारिश नहीं और हमने प्रोग्राम बनाया जाखू मंदिर जाने का ,वो भी सुबह सुबह ताकि हम बच्चों के उठने से पहले होकर वापिस आ जाएँ क्योंकि बच्चों का मंदिर जाने का कोई विचार नहीं था | इसलिए हम पांच लोग जाखू मंदिर के लिए निकले |
जाखू मंदिर जाने के लिए 
1.एक तो आप रिज के पास से रास्ता जाता है वहां से जा सकते हैं जो पैदल चढ़ाई करना चाहते हों ,एक दम सीधी चढ़ाई है इसलिए थोड़ी कठिन है पर दो घंटे में आप चढ़ाई कर सकते हैं |
2.दूसरा चर्च के पीछे से एक गवर्मेंट की टैक्सी चलती है वहां से जा सकते हैं वो केवल एक ही टैक्सी है जो वहां के स्थानीय लोगों के लिए सरकार द्वारा लगाई गई है उसी में वो कुछ यात्रियों को भी बिठा लेते हैं 10-10 रुपये लेकर ,उसके आते ही लोग झपट पड़ते हैं जो घुस गया वोही जा सकता है |
3.पोनी द्वारा भी आप चढ़ाई कर सकते हैं |
4. तीसरा आप किराये की टैक्सी लेकर भी वहां जा सकते हैं जिसका किराया सिर्फ वहीँ जाने के लिए 300 या 400 है ,अगर आप किसी और ट्रिप के साथ उसे लेते हैं तो इसका किराया 200 रुपये लिया जाता है |                             जाखू मंदिर जाने के लिए रिज के पास से ही रास्ता जाता है यह 2.5 किलोमीटर दूर है ,यहाँ पैदल, पोनी से या टैक्सी से जाया जा सकता है | भगवान हनुमान को समर्पित यह धार्मिक स्थल 'रिज' के निकट स्थित है।

जाखू मंदिर, जाखू पहाड़ी पर स्थित है | बर्फीली चोटियों, घाटियों और शिमला शहर का सुंदर और मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है। यहाँ से पर्यटक सूर्योदय और सूर्यास्त के लुभावने दृश्यों का आनंद ले सकते हैं।
                    तो जनाब हमने प्राइवेट टैक्सी लेने की सोची जो की एक किलोमीटर दूर खड़ी थी पहले वहां तक पैदल मार्च करना पड़ा हमें ,वहां पहुँचने के लिए हमें आधा घंटा लग गया 
उसके बाद हम टैक्सी में बैठे ,रास्ता काफी खतरनाक था सीधी चढ़ाई थी सिर्फ 15 मिनट में ही हम पहुँच गए हनुमान जी के जाखू मंदिर | गाड़ी से उतरने से पहले ही हमें ड्राईवर ने हिदायत कर दी की चश्मा उतार कर जेब में रख लें पर्स ,बैग या तो छुपा लें या यहीं गाड़ी में छोड़ कर जायें क्योंकि वहां के बंदर बहुत बदमाश हैं वो सब छीन ले जाते हैं | मंदिर के द्वार पर ही पहुंचे की किसी ने कहा लाठी साथ लेकर चलें बंदर बहुत हैं ,तब लाठी बेचने वाले ने कहा साथ प्रसाद लेना अनिवार्य है | खैर हम चल पड़े बंदरों से बचते बचाते सीड़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर खुले मैदान में पहुंचते ही फिर बंदर हमारे पीछे पीछे आ गए क्योंकि मैंने अपना पर्स दुपट्टे के नीचे छुपा रखा था | मेरा दुपट्टा छीनने लगे ,तभी डैडी ने अपनी बेल्ट निकाली तो तब वो थोड़ा दूर भागे | आप पर्स वगेरह कुछ ना लेकर जायें तो बंदर दूर ही रहते हैं |
तब मंदिर के बाहर ही एक कमरा बना हुआ था जिसमें चप्पल वगेरह अपना सामान रख सकते थे |



उसके बाद मंदिर में गए यहाँ बाहर एक कर्मचारी वर्दी में तैनात था जो लाठी लिए हुए बंदरों को मंदिर में घुसने से हटा रहा था | मंदिर में जाकर दर्शन कर ,परिकर्मा की| वहां एक बोर्ड के ऊपर लिखा था की जब हनुमान संजीवनी बूटी लेने जा रहे थे तो यहाँ वो थोड़ी देर रुके थे | मंदिर दर्शन के बाद हम वापिस चप्पल पहन बंदरों से बचते बचाते गाड़ी तक पहुंचे | जो 15 मिनट में वापिस हमें ले आई ,उसके बाद फिर वोही आधा घंटा चल कर हम दोबारा होटल में पहुँच गए |
सभी तब तक तैयार हो चुके थे इसलिए हम सबने आसपास के दर्शनीय स्थलों को देखने का फैसला किया | इसके लिए हम रिज रोड पर आगे निकल गए क्योंकि वहां बहुत टैक्सी वाले दलाल आपको मिल जाते हैं , जिसका पता हमने लिया था उसके पास ही हम पहुँच गए उसके पास तीन चार अलग अलग ट्रिप की लिस्ट थी जिसमें से हमने पहला ट्रिप लिया जिसमें उसने हमें कुफरी,इंदिरा टूरिस्ट पार्क,चीनी बंगलो,फागू वैली ,नाग मंदिर दिखाना था | जिसका रेट 1400 रुपये बताया गया बड़ी गाड़ी का जबकि छोटी गाड़ी का रेट 1000 रुपये था ,वो 1600 रुपये में हमें ले जाने के लिए तैयार हो गया जिसमें हमने एक दूसरे ट्रिप की जगह एम्यूजमेंट पार्क भी शामिल किया था, जिसके 200 रुपये उसने फालतू लिए थे |
कुफरी 
   इसके बाद हम गाड़ी में बैठ निकले कुफरी की तरफ जो शिमला से 16 किलोमीटर दूर है ,रास्ते में एक जगह उसने रोक कर कहा यह ग्रीन वैली है ,हमने वापिसी में दिखाने के लिए कहा ,पहले सीधे कुफरी जाने की इच्छा जताई | कुफरी पहुँच कर उसने हमें उतार दिया गाड़ी पार्क कर दी और कहा यहाँ से घोड़े जाते हैं जो आपको फागू वैली नाग मंदिर महासू पीक एप्पल गार्डन दिखायेंगे | वहां से हमने घोड़े किये जिसका रेट तह था 380 रुपये प्रति सवारी ,घोड़े वाले ने जाने से पहले ही आगाह किया... पहुँचने में थोड़ा समय लगेगा आप लघुशंका से निवृत हो लें यहाँ पर भी उसकी सेटिंग थी ,अंदर गंदे से शौचालय में जाने के लिए 5 रुपये लिए गए |

               अब चले हम घोड़ों पर होकर सवार फागू वैली के लिए |हम आठ लोगों के साथ सिर्फ दो घोड़ों के रखवाले थे और रास्ता इतना गन्दा ,ऊँचा नीचा ,गहरे खड्डे और कहीं कहीं घुटनों घुटनों तक दलदल | जिसमें से सब राम राम करते ही निकल रहे थे | बचते बचाते हुए,घोड़ेवाले के निर्देशों का पालन करते हुए ...जैसे चढ़ाई के वक्त वो बोलता आगे झुको और पैर पीछे उतराई के वक्त वो बोलता पीछे को झुको और पैर आगे रखो ...
आखिर पहुंचे हम सब फागू वैली यहाँ घोड़े वाले ने उतार दिया और बोला एक घंटे बाद फ़ोन कर दें उसे बुलाने के लिए |






फागू वैली एक उजड़े हुए खेत के सिवाए कुछ भी नहीं था ,यहाँ दो याक थे जिस पर लोग फोटो खिंचवा रहे थे ,कुछ स्टाल टाइप की दुकानें जिन पर मैग्गी ,पेप्सी वगेरह मिल रही थी | एक दो दुकानों पर शाल स्वेटर भी रखे थे ,क्योंकि बारिश में ऊपर ठण्ड हो जाती होगी | वहां बैठे बैठे सबने मैग्गी वगेरह ले ली थी | फिर सब इधर उधर घूमने लगे ,हम कुछ लोग ऊपर नाग मंदिर चले गए |



थोड़ी दूरी पर ही यह मंदिर सामने ही नजर आता है वहां 20..25 सीड़ियाँ हैं यहाँ जाकर हम माथा टेक वापिस आ गए फोटो खींचते खिंचाते हुए ,यहीं साथ ही सेबों के बहुत से पेड़ हैं जिसे एप्पल वेल्ली के नाम से जाना जाता है |यहाँ भी बंदर बहुत नजर आते हैं |
    यहाँ से हम वापिस लौटे और फिर आकर घोड़े वाले को फ़ोन किया जो 15..20 मिनट में आ गया | फिर से हमें घोड़ों पर चढ़ाया गया पैर फंसाये गए और हिदायतें देते हुए हमें नीचे उतारने लगे घोड़े वाले |घोड़े अपनी मन मर्जी से चलते हुए हमें ढो कर चल ही रहे थे ,जब हम पहुँचने ही वाले थे तभी बेटे अभिषेक का घोड़ा गिर पड़ा और वो पता नही कैसे अपने पैर निकाल कर एक साइड को उछल गया यहाँ घोड़े वाले ने उसे एक दम से पकड़ लिया और वो ओंधे मुंह गिरने से बच गया | बस 5 मिनट बाद ही हम सब भी नीचे पहुँच गए और घोड़ों से उतर गए | 
    यहाँ घोड़ों पर चढ़ना बिलकुल भी सुरक्षित नहीं है इनके चक्कर में ना आयें | एक तो वहां देखने लायक कुछ भी नहीं दूसरा वहां पहुँचने का रास्ता बिल्कुल असुरक्षित है |सर्दिओं में यहाँ बर्फ़बारी देखने लोग आ सकते हैं |                   इसे देखने के बाद हम दोबारा गाड़ी में बैठ कर पहुँचे चिड़ियाघर देखने ,यहाँ की टिकट 10 रुपये थी ,हमने टिकट ले ली और चले जानवरों से रूबरू होने ..यह काफी बड़ी जगह में फैला हुआ है और जानवर खुले में पता नहीं कहाँ कहाँ छुपे बैठे थे उनके आसपास काफी बड़ी बाड़ लगी हुई थी | वहां ज्यादा जानवर नहीं हैं | 




इसे देखने के बाद हम वापिस आ गए क्योंकि चीनी बंगले में कुछ देखने लायक था नहीं सिर्फ एक पुराना बंगला है जिसमे अब रेस्तौरेंट बना दिया गया है | यहाँ खाने को भी ख़ास कुछ नहीं मिलता |                      
हम वापिस शिमला की तरफ चल पड़े | रास्ते में ही कुफरी से आते हुए 'हिप हिप हुर्रे' के नाम से एक एम्यूजमेंट पार्क है जिसमें बच्चों के लिए करने को काफी कुछ है ,इसकी प्रवेश टिकट तो 20 रुपये है लेकिन अंदर झूले लेने की या कुछ गेम के पैकज हैं जो 250 रुपये से 450 रुपये प्रति व्यक्ति टिकट है | इसमें एक रेस्तोरेंट भी है जिसमें आप चाय नाश्ता ले सकते हैं या खाना भी खा सकते हैं |यहाँ एक कपड़े की और एक मिठाई की दुकान है यहाँ कई प्रकार के फलों की बर्फी मिलती है | यहाँ सबने खूब मस्ती की ,फिर चाय पकौड़े लिए और बर्फी लेकर उसके बाद दोबारा हम बाहर आकर गाड़ी में बैठ गए |






           रास्ते में शिमला से कुछ किलोमीटर ही दूर ग्रीन वैल्ली है यहाँ गाड़ी रोकी गई ,वहां सड़क पर ही खड़े होकर आप बस पीछे के हरे भरे पेड़ों की तस्वीर ले सकते हैं इसी को ग्रीन वैल्ली कहते हैं | 



        इसके बाद हम सब वापिस पहुँचे शिमला के टैक्सी स्टैंड की तरफ जो लक्कड़ बाजार के पास है | वहां टैक्सी वाले ने हमें उतार दिया ,यहाँ से फिर पैदल चल कर आपको जाना पड़ता है ,यहाँ से आगे गाड़ियाँ नहीं जाती हैं | हम वापिस बाजार में घूमते हुए वापिस होटल पहुँचे और कुछ चाय पकौड़े का दौर चला और साथ ही सब पैकिंग वगेरह करने लगे क्योंकि सुबह हमें निकलना था ,थोड़ी देर सबने आराम किया और फिर रात को हम सब खाना खाने के लिए निकले | हमने खाना खाया और वापिस होटल पहुँच गए और बाकी की पैकिंग हमने कर ली और सो गए |


Shimla photos, Night view of Shimla

शिमला रात का नजारा 

सोमवार, 25 अगस्त 2014

शिमला यात्रा वृतांत भाग 1.


दोस्तों वैसे तो आपने बहुत यात्रा वृतांत पढ़े होंगे लेकिन उनका लाभ कभी नहीं उठाया होगा क्योंकि उसे पढने के बाद एक आम कहानी की तरह पढ़ कर उसे भूल जाते हैं लेकिन मैं अपने यात्रा वृतांत में कोशिश करती हूँ उसमें आई समस्याओं का ,उसमें मिले आनंद का सीधा सीधा अनुभव आप सबसे बाँटने का | 
दिल्ली में गर्मी का मौसम भी सर्दी की तरह ही अपने पूरे शबाब पर होता है फिर साथ में स्कूल की छुट्टियाँ तो भला कौन नहीं जाना चाहेगा अपने मनपसंद पर्वतीय स्थल की यात्रा पर ,वैसे तो दिल्ली वाले सबसे नजदीक मंसूरी में एक दो छुट्टी मिलते ही पहुँच जाते हैं | लेकिन अब गर्मी से थोड़ी राहत पाने के लिए हमने फैसला किया शिमला जाने का | कालका शताब्धि की 8 टिकटे पहले से ही बुक करवा ली गईं थीं |
शिमला 
 शिमला, हिमाचल प्रदेश प्रान्त की राजधानी है। शिमला की खोज अंग्रेजों ने सन 1819 में की।1864 में, शिमला को भारत में ब्रिटिश राज की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया था। एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल, शिमला को अक्सर ' पहाड़ों की रानी ' के रूप में जाना जाता है। शिमला हिमाचल प्रदेश प्रान्त की राजधानी है| शिमला एक पर्यटक स्थल के रूप में भी मशहूर है।शिमला ठंडी जलवायु, सुरम्य प्राकृतिक दृश्यों, हिमाच्छादित पहाड़ी दृश्यों, चीड़ और देवदार के जंगलों और औपनिवेशिक वास्तु के आकर्षक शहरी भूदृश्य के लिये विख्यात है। यहां का नाम देवी श्‍यामला के नाम पर रखा गया है जो काली का अवतार है। शिमला लगभग 7267 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यह अर्ध चक्र आकार में बसा हुआ है |



आखिर वो दिन आ ही गया जिसका बेसब्री से इंतज़ार था यानी शिमला जाने का | तैयारी तो तभी शुरू हो गई थी जब टिकटे बुक हुईं थी और जाने से एक दिन पहले देर रात तक चल ही रही थी ,क्योंकि हमेंने 1 जुलाई को सुबह 7.40 की ट्रेन पकड़नी थीं और घर से स्टेशन पहुँचने में लगभग 45 मिनट लग जाते हैं इसलिए सुबह 4.30 बजे ही उठकर तैयार होने लगे थे क्योंकि कोई नाश्ता खाना वगेरह नहीं ले जाना था साथ में ,कुछ सूखा खाने का सामान लिया साथ में ,5.40 बजे हम तीन लोग घर से निकल चुके थे और 6 बजे हम सब मेट्रो में थे | 6.40 पर हम नई दिल्ली स्टेशन पर थे |

          मेट्रो से उतरकर नई दिल्ली स्टेशन तक पहुँचने में 10 से 15 मिनट लग जाते हैं क्योंकि मेट्रो की बहुत सारी सीढियां चढ़ कर ही आप बाहर निकल सकते हैं | यहाँ से अगर आप सामान नहीं उठा सकते तो आपको कुली मिल जाते हैं क्योंकि आगे प्लेटफोर्म तक पहुँचने के लिए भी आपको काफी जदोजहद करनी पड़ती है इस का सबसे बड़ा कारण है यहाँ स्वचालित सीढियां होते हुए भी उनको बंद रखा जाता है ताकि कुली लोगों की आपको जरुरत रहे | ऐसी मानसिकता के कारण ही एक मेट्रो सिटी होते हुए भी नई दिल्ली स्टेशन पर आने वाले सभी यात्री एक गलत सन्देश लेकर जाते हैं |
         तो जनाब हम पहुँच गए प्लेटफ़ॉर्म पर लेकर सब सामान ठीक 7 बजे और इंतजार करने लगे बाकी 5 सदस्यों का जिनको पास ही से आना था और 10 मिनट में वो लोग भी पहुँच चुके थे | 7.30 पर गाड़ी आ चुकी थी हम सब आराम से उसमें बैठ गए थे और 7.40 पर गाड़ी चल पड़ी थी अपने गंतव्य की ओर ....


गाड़ी चलने के कुछ मिनट बाद ही उसमें अनाउंसमेंट हुई .... यह गाड़ी कालका शताब्दि दिल्ली से कालका जा रही है हम 267 किलोमीटर की यात्रा 4 घंटे 15 मिनट में पूरी करेंगे | आपकी यात्रा शुभ हो | मेट्रो की ही तरह उसमें भी हर स्टेशन से पहले अनाउंसमेंट हो रही थी | 8.10 पर चाय बिस्कुट दिए गए केतली में गर्म पानी और साथ में चाय बनाने का अंग्रेजी सामान जिसमें एक दूध का पाउच,एक चीनी का और एक चाय का ,अगर दोबारा इच्छा हो चाय पीने की तो यह सब सामान आप दोबारा ले सकते हैं | 
8.55 पर गाड़ी पानीपत जंक्शन पर रुकी और उसके बाद 9.30 बजे नाश्ता बाँट दिया गया जिसमें था ब्रेड मक्खन ,कुछ कटलेटस और दोबारा वही गर्म पानी की केतली और साथ में अब की बार चाय के साथ कॉफ़ी के भी पाउच थे जो मन चाहे ले सकते हैं | मेरे जैसे चाय कॉफ़ी ना पीने वाले लोग गर्म पानी में दूध और चीनी डाल कर ले सकते हैं |
9.40 पर कुरुक्षेत्र जंक्शन पहुँच गए | इसके बाद भोजन बांटने वाले एक पेपर ले कर आ गए जिस पर लिखना था कि खाना कैसा लगा और टिप भी मांगी जा रही थी आपको सर्व करने की | 
फिर 10.25 पर आ गया अम्बाला कैंट और 11.20 पर पहुंचे चंडीगढ़ गाड़ी 5 से 8 मिनट तक रुकी और फिर रवाना हुई अपने असली मुकाम की ओर ,और ठीक 12 बजे हम कालका स्टेशन पर उतर गए |

अब कालका से आपके पास कई साधन हैं शिमला पहुँचने के जिसकी दूरी लगभग 96 किलोमीटर रेल मार्ग से और 99 किलोमीटर सड़क मार्ग से है | बस अड्डे के लिए आपको स्टेशन से ऑटो मिल जाते हैं |

1. टॉय ट्रेन :- छोटी ट्रेन जो कालका से शिमला तक आपको पहुंचाती है | इसका आम किराया 50 रुपये है और आरक्षित सीट का किराया 250 रुपये है जिसकी सीट कुछ सुविधाजनक है |
2. यहीं से चलती है डीलक्स रेल कार जिसमे एक ही डिब्बा होता है और 18 सीट होती हैं ,जिसका किराया है 650 रुपये प्रति यात्री जो वातानुकूलित है और उसमें आपको चाय नाश्ता भी दिया जाता है | डीलक्स रेल मोटर कार की छत पारदर्शी फाइबर-ग्लास की बनी है, जिससे आसमान बिल्कुल साफ दिखता है। यह विदेशी, खासकर ब्रिटिश पर्यटकों और भारतीय उद्योगपतियों में बहुत लोकप्रिय है। पूरी मोटर कार भी बुक करवाई जा सकती है। कालका से शिमला तक की दूरी तय करने में इसे चार घंटे और 25 मिनट का समय लगता है।
3. आप टैक्सी करके जा सकते हैं जो आपसे 2500 रुपये से 3000 रुपये तक ले लेते हैं और लगभग 3 घंटे में आपको पहुंचा देते हैं | कुशल ड्राईवर ही लें यहाँ से |
4. आप रोडवेज की बस पकड़ कर भी जा सकते हैं जिसका आम बस का किराया 100 रुपये है और डीलक्स बस का किराया लगभग 200 रुपये है | यह आपको लगभग 3.30 घंटे में शिमला पहुंचाती है |

हमने टॉय ट्रेन से जाने का फैसला किया इसलिए उसकी आठ टिकट ले ली गई 50 रुपये प्रति टिकट | एक गाड़ी जाने को तैयार खड़ी थी | दूसरी 12.45 पर जाने वाली थी , जब गाड़ी देखने लगे तो पता चला इसकी सीट आरक्षित भी हो सकती हैं उसका किराया 250 रुपये है प्रति टिकट जिसमे कोई ख़ास फर्क हमें नजर नहीं आया सिवाए इसके की उसकी सीट थोड़ी खुली लग रही थी फिर भी हमने 1600 रुपये और देकर सीट आरक्षित करवा ली जिसका अलग काउंटर लगा हुआ था | अब समय हो चुका था इसलिए हम सब गाडी में बैठ गए और शुरू हुआ हमारा कालका से शिमला का सफ़र ,यह सीटें कुछ खुली तो जरुर थीं पर दो लोग सही से इस पर बैठ भी नही पा रहे थे इसमें 30 सीट थीं और एक छोटा सा शौचालय भी इसमें था | 
टॉय ट्रेन नैरो गेज पर चलती है इसकी रफ़्तार 20 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है ऐसा बताया जाता है लेकिन यह बीच में बहुत बार रूकती हुई जाती है ताकि दूसरी तरफ से आने वाली ट्रेन क्रॉस कर सके | 







कालका से शिमला के बीच आने वाले स्टेशन

1. कालका 2. टकसाल 3. गुम्मन 4. कोटी 5. जाबली 6. सनवारा 7. धर्मपुर 8. डगशांई 9. बड़ोग 10. सोलन ब्रूरी 11. सलोगड़ा 12. कंडाघाट 13. कैथलीघाट 14. शोधी 15. तारादेवी 16. जलोग 17. समरहिल 18. शिमला
            कोटी क्रासिंग स्टेशन जो सबसे पहले आया उस पर जब रुकने के बाद ट्रेन दोबारा चली तो 2 बज चुके थे | धीरे धीरे कछुआ चाल से अपने गंतव्य की तरफ हम आगे बढ़ रहे थे रेल मार्ग में 103 छोटी बड़ी सुरंग आती हैं जब क्रासिंग स्टेशन पर गाड़ी रूकती तो कुछ खोमचे वाले अपना सामान बेचते हैं ,बाकि रास्ते में खाने की कोई सुविधा नही है अगर आप बच्चों के साथ हैं तो खाने का कुछ प्रबंध कर के ही जाइये | सब लोग बहुत थक चुके थे क्योंकि इस रास्ते से दोगुना समय लगा यानि लगभग 7 घंटे, हम ठीक 7 बजे शिमला स्टेशन पर पहुँच चुके थे | 
यहाँ से बाहर निकलने के लिए और ऊपर होटल तक पहुँचने के लिए हमने कुली से सामान उठवाया और पहुँच गए माल रोड के शुरू में हम सब वहां बैठकर इंतज़ार करने लगे और 2 लोग होटल वगेरह देखने चले गए कुली के साथ| 
8 बज चुके थे सब बुरी तरह से थक चुके थे एक होटल रिज व्यू पसंद आया चर्च के पीछे ऊपर जाकर ठीक रिज चौंक के पास जिसके लिए लगभग 3 किलोमीटर सबको चल कर जाना था क्योंकि वहां कोई रिक्शा वगेरह की सुविधा नहीं है सभी को पहले ही रोक दिया जाता है ,कोई गाड़ी वगेरह भी अंदर प्रवेश नहीं कर सकती | आखिरकार चलते चलते हम 9 बजे होटल पहुँचे बुरी तरह से थकान से चूर चूर | 



उसके बाद वहीँ हमने खाना मंगवा लिया क्योंकि दोबारा उतरकर नीचे जाना और फिर वापिस आना सबके लिए मुश्किल था ,टॉय ट्रेन ने हमें टॉय की तरह ही तोड़ कर रख दिया था | 

शिमला यात्रा भाग 2. क्रमशः ...

सोमवार, 28 जुलाई 2014

हरिद्वार यात्रा भाग 4.

बड़ा बाजार :-
यह हरिद्वार का तड़क-भड़क वाला बाजार है। यहां फेरीवाले विभिन्न प्रकार के व्यंजन, आयुर्वेदिक दवाएं, पीतल का सामान, कांच की चूड़ियां, शालें, लकड़ी से बनी विभिन्न वस्तुएं और बांस से बनी टोकरियां बेचते नज़र आते हैं। इसी बाजार में ही सभी पण्डे बसे हुए हैं जो हिन्दू वंशावलियो की पंजिका रखते हैं |

हरिद्वार में हिन्दू वंशावलियों की पंजिका---
वह जो अधिकतर भारतीयों व वे जो विदेश में बस गए को आज भी पता नहीं, प्राचीन रिवाजों के अनुसार हिन्दू परिवारों की पिछली कई पीढियों की विस्तृत वंशावलियां हिन्दू ब्राह्मण पंडितों जिन्हें पंडा भी कहा जाता है द्वारा हिन्दुओं के पवित्र नगर हरिद्वार में हस्त लिखित पंजिओं में जो उनके पूर्वज पंडितों ने आगे सौंपीं जो एक के पूर्वजों के असली जिलों व गांवों के आधार पर वर्गीकृत की गयीं सहेज कर रखी गयीं हैं. प्रत्येक जिले की पंजिका का विशिष्ट पंडित होता है. यहाँ तक कि भारत के विभाजन के उपरांत जो जिले व गाँव पाकिस्तान में रह गए व हिन्दू भारत आ गए उनकी भी वंशावलियां यहाँ हैं. कई स्थितियों में उन हिन्दुओं के वंशज अब सिख हैं, तो कई के मुस्लिम अपितु ईसाई भी हैं. किसी के लिए किसी की अपितु सात वंशों की जानकारी पंडों के पास रखी इन वंशावली पंजिकाओं से लेना असामान्य नहीं है.
शताब्दियों पूर्व जब हिन्दू पूर्वजों ने हरिद्वार की पावन नगरी की यात्रा की जोकि अधिकतर तीर्थयात्रा के लिए या/ व शव- दाह या स्वजनों के अस्थि व राख का गंगा जल में विसर्जन जोकि शव- दाह के बाद हिन्दू धार्मिक रीति- रिवाजों के अनुसार आवश्यक है के लिए की होगी. अपने परिवार की वंशावली के धारक पंडित के पास जाकर पंजियों में उपस्थित वंश- वृक्ष को संयुक्त परिवारों में हुए सभी विवाहों, जन्मों व मृत्युओं के विवरण सहित नवीनीकृत कराने की एक प्राचीन रीति है |


खरीददारी :-
हर की पौडी और रेलवे स्टेशन के बीच अनेक दुकानें हैं जहां तीर्थयात्रा से संबधित सामान मिलता है। यहां से पूजा के कृत्रिम आभूषण, पीतल और कांसे के बर्तन, कांच की चूड़ियां आदि खरीदी जा सकती हैं। यहां बहुत सी मिठाई की दुकानें हैं जहां से स्वादिष्ट पेडों की खरीददारी के साथ चूरण और आम पापड़ भी खरीदे जा सकते हैं। सामान्यत: तीर्थ यात्री यहां से कंटेनर खरीदकर गंगाजल भरकर घर ले जाते हैं |


आइये जानें हरिद्वार के आसपास लगते कुछ और देखने योग्य स्थान 
पतंजलि योगपीठ :---
पतंजलि योगपीठ हरिद्वार से लगभग 25 किलोमीटर दूर है इसलिए टेम्पो वाले ने 30 रुपये प्रति सवारी लिए वहां जाने के लिए | पतंजलि योग पीठ एक नजर में .....
पतंजलि योगपीठ फेज 1
6 अप्रेल 2006 को भारत के उपराष्ट्रपति द्वारा देश के 17 मुख्यमंत्री व राज्यपाल आदि विशिष्ट लोगों की उपस्थिति में पतंजलि योगपीठ, प्रथम चरण का उदघाटन।
योग एवं आयुर्वेद ओ.पी.डी.में छ: हजार से दस हजार रोगियों को निःशुल्क चिकित्सा परामर्श की सुविधा उपलब्ध।
निःशुल्क आयुर्वेद व योग चिकित्सा परामर्श सुयोग्य वैद्यों द्वारा।
आयुर्वेद के अंतर्गत पंचकर्म चिकित्सा, षट्कर्म चिकित्सा, शल्य चिकित्सा (क्षार-सूत्र, कर्णभेदन व अग्निकर्म आदि), दंत चिकित्सा व नेत्र चिकित्सा सेवायें न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध।
दिव्य फार्मेसी द्वारा निर्मित उच्च गुणवत्ता युक्त आयुर्वेदिक औषधियाँ न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध है।
अत्याधुनिक मशीनों व उपकरणों से युक्त विश्व की आधुनिकतम पैथोलाजी लैब, रेडियोलाजी व कार्डियोलाजी लैब में विभिन्न रोगों के चिकित्सीय परीक्षण न्यूनतम मूल्यों पर उपलब्ध है ।
आई.पी.डी/अतिथि ग्रह में न्यूनतम मूल्यों पर, वातानुकूलित व साधारण आवास व्यवस्था, दैनिक यज्ञ एवं योगकक्षा के साथ उपलब्ध है।
पुस्तकालय व वाचनालय की सुन्दर व्यवस्था साइबर कैफे के साथ उपलब्ध है।
अन्नपूर्णा में शुध्द देशी घी/तेल से निर्मित सभी तरह के शुध्द सात्विक आहार एवं मिष्ठान उचित मूल्य पर उपलब्ध है।
पतंजलि योगपीठ के समीप में स्थित दिव्य औषधीय उद्यान में भ्रमण व औषधीय पौधों की उपलब्धता की व्यवस्था है।
पतंजलि योगपीठ में व्यवस्थित व विशाल पार्किंग व अमानती घर की व्यवस्था है।
पतंजलि योगपीठ फेज 2
950 कक्षों में आगन्तुकों की वातानुकूलित व गैर वातानुकूलित आवास व्यवस्था।
1000 लोगों की आवास व्यवस्था वाली एक निःशुल्क धर्मधाला।
20 हजार वर्ग फीट के आकार का भव्य लंगर हाल, जहाँ आगन्तुक निःशुल्क भोजन प्रसाद ग्रहण कर सकते है ।
प्रतिदिन 5000 आगन्तुकों की भोजन व्यवस्था की विशाल अन्नपूर्णा।
4 हजार वर्ग फीट में निर्मित भव्य यज्ञशाला।
वानप्रस्थ आश्रम के अन्तर्गत स्वस्थ, समर्थ व समर्पित वरिष्ठ नागरिकों की आवास व्यवस्था हेतु 350 अपार्टमेन्ट।
50 हजार वर्ग फीट में निर्मित भव्य संग्रहालय।
11 हजार वर्ग फीट आकार का योग, आयुर्वेद व प्राच्य विधाओं पर आधारित साहित्य व सामग्री हेतु विक्रय केन्द्र।
भारत माता नमन स्थल (निर्माणाधीन), जहाँ भारत के 600 से अधिक जनपदों से एकत्रित की गई पवित्र मिट्टी रखी जाएगी।

यहाँ 2 लाख वर्ग फ़ीट का विशाल नवीन ऑडिटोरियम बनाया गया है जिसमें 10 हजार साधक एक साथ बैठकर योग कर सकते है। इसी प्रकार 60 हजार वर्ग फीट का वृहत वातानुकूलित आडिटोरियम का निर्माण कराया गया है , जहाँ हजारों साधक एक साथ बैठकर योग, प्राणायाम व ध्यान आदि कर सकेंगे। 44 हजार वर्ग फीट का विशालकाय पंचकर्म व षट्कर्म केन्द्र, जहाँ लगभग 1000 व्यक्ति प्रतिदिन पंचकर्म व षट्कर्म का लाभ प्राप्त कर सकेंगे।

शांतिकुंज :-
शांति कुञ्ज संस्थान का विवरण :-
गंगा की गोद, हिमालय की छाया में विनिर्मित गायत्री तीर्थ- शांतिकुंज, हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर रेलवे स्टेशन से छह किलोमीटर दूरी पर स्थित है, जो युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (1911-1990) एवं माता भगवती देवी शर्मा (1926-1994) की प्रचंड तप साधना की ऊर्जा से अनुप्राणित है। यह जागृत तीर्थ लाखों-करोड़ों गायत्री साधकों का गुरुद्वारा है।

1971 में स्थापित शांतिकुंज एक आध्यात्मिक सैनिटोरियम के रूप में विकसित किया गया है, जहाँ शरीर, मन एवं अंतःकरण को स्वस्थ, समुन्नत बनाने के लिए अनुकूल वातावरण, मार्गदर्शन एवं शक्ति अनुदानों का लाभ उठाया जा सकता है।यहाँ गायत्री माता का भव्य देवालय, सप्तर्षियों की प्रतिमाओं की स्थापना के साथ एक भटके हुए देवता का मंदिर भी है। गायत्री साधक यहाँ के साधना प्रधान नियमित चलने वाले सत्रों में भाग लेकर नवीन प्रेरणाएँ तथा दिव्य प्राण ऊर्जा के अनुदान पाकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति में सहायता पाते हैं।

सन्‌ 1926 से प्रज्ज्वलित अखंड दीप यहाँ स्थापित है, जिसके सान्निध्य में पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने कठोर तपस्या करके इसे विशाल गायत्री परिवार की सारी महत्वपूर्ण उपलब्धियों का मूल स्रोत बनाया। इसके सान्निध्य में 2400 करोड़ से अधिक गायत्री जप संपन्न हो चुके हैं। इसके दर्शन मात्र से दिव्य प्रेरणा एवं शक्ति संचार का लाभ सभी को मिलता है।

आश्रम की तीन विराट यज्ञशालाओं में नित्य नियमित रूप से हजारों साधक गायत्री यज्ञ संपन्न करते हैं। भारतीय संस्कृति के अंतर्गत सभी संस्कार जैसे- पुंसवन, नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, शिखास्थापन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत, विवाह, वानप्रस्थ तथा श्राद्ध कर्म आदि यहाँ निःशुल्क संपन्न कराए जाते हैं। इनके व्यावहारिक तत्वदर्शन से प्रभावित होकर यहाँ नित्य बड़ी संख्या में संस्कारों के लिए लोग आते हैं।

शांतिकुंज के भव्य जड़ी-बूटी उद्यान में 300 से भी अधिक प्रकार की दुर्लभ-सर्वोपयोगी वनौषधियाँ लगाई गई हैं। विश्वभर के आयुर्वेद कॉलेजों के शिक्षार्थी तथा वैज्ञानिक यहाँ का वनौषधि उद्यान देखने आते हैं। विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों के लिए भिन्न प्रकार की दिव्य औषधियों का एक ज्योतिर्विज्ञान सम्मत उद्यान यहाँ की एक विलक्षणता है। सभी आगंतुकों की शारीरिक-मानसिक जाँच-पड़ताल निष्णात चिकित्सकों द्वारा यहाँ निःशुल्क की जाती है तथा साधना के साथ-साथ वनौषधि प्रधान उपचार-परामर्श भी दिया जाता है।

यहाँ के विशाल भोजनालय में प्रतिदिन प्रायः पाँच हचार से अधिक आगंतुक श्रद्धालु तथा अनुमति लेकर आए शिक्षार्थी बिना मूल्य भोजन प्रसाद पाते हैं। यहाँ का पत्राचार विद्यालय भारत एवं विश्वभर में बैठे जिज्ञासुओं, प्रज्ञा परिजनों को दिनोदिन जीवन की उलझनों को सुलझाने का मार्गदर्शन देता रहता है।

अध्यात्म के गूढ़ विवेचनों की सरल व्याख्या कर उन्हें जीवन में कैसे उतारा जाए, अपने चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता लाकर व्यक्तित्व को कैसे प्रभावकारी बनाया जाए, इसका सतत प्रशिक्षण यहाँ के नौ दिवसीय संजीवनी साधना सत्रों में चलता है, जो यहाँ वर्षभर संपादित होते रहते हैं। ये सत्र 1 से 9, 11 से 19, 21 से 29 की तारीखों में प्रति माह चलते हैं।पाँच दिवसीय मौन अंतः ऊर्जा जागरण सत्र यहाँ की विशेषता है। इनमें 60 साधक प्रति सत्र उच्चस्तरीय साधना करते हैं। ये ठंडक में आश्विन से चैत्र नवरात्र तक चलते हैं।

केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों के विभिन्न पदाधिकारियों को यहाँ नैतिक बौद्धिक तथा व्यक्तित्व परिष्कार का शिक्षण पाँच दिवसीय सत्रों में दिया जाता है। अब तब अस्सी हजार से अधिक अधिकारीगण इन मूल्यपरक शिक्षणों से लाभ पा चुके हैं। यहाँ हिमालय की एक दिव्य विराट प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसमें सभी तीर्थों का दिग्दर्शन साधकों को वहाँ के इतिहास की पृष्ठभूमि के साथ मल्टीमीडिया प्रोजेक्शन पर किया जाता है। प्रायः साठ फुट चौड़ी, पंद्रह फुट ऊँची प्रतिमा के समक्ष बैठकर ध्यान करने का अपना अलग ही आनंद है। समीप स्थित देवसंस्कृति दिग्दर्शन में मिशन के वर्तमान स्वरूप व भावी योजनाओं का चित्रण किया गया है।

यहाँ से 'अखंड ज्योति' एवं 'युग निर्माण योजना' नामक हिंदी मासिक तथा ‘युग शक्ति गायत्री’ गुजराती, मराठी, उड़िया, बांग्ला, तमिल, अंग्रेजी एवं तेलुगू भाषाओं में तथा ‘प्रज्ञा अभियान’ पाक्षिक हिंदी व गुजराती में प्रकाशित होती हैं। भारत और विश्व में इन सभी पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या लगभग पच्चीस लाख है।कृषि मंत्रालय भारत सरकार द्वारा शांतिकुंज को 'आपदा निवारण सलाहकार परिषद' की सदस्यता प्रदान की गई है। भूकंप व अन्य दैवी आपदाओं में केंद्र ने जन व शक्ति से सदैव मदद की है। कारगिल संकट पर पूरे भारत से गायत्री परिवार ने सवा करोड़ रुपए की राशि राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में दी। भुज कच्छ में प्रायः पाँच करोड़ रुपए से पुनर्वास के कार्य किए गए।

लगभग एक हजार उच्च शिक्षित कार्यकर्ता शांतिकुंज में स्थायी रूप से सपरिवार निवास करते हैं। निर्वाह हेतु वे औसत भारतीय स्तर का भत्ता मात्र संस्था से लेते हैं।इस प्रकार शांतिकुंज एक ऐसी स्थापना है, जिसे सच्चे अर्थों में युग तीर्थ कहा जा सकता है। यहाँ आने वाला व्यक्ति कृतकृत्य होकर जाता है एवं नैसर्गिक सौंदर्य तथा आध्यात्मिक ऊर्जा से अनुप्राणित वातावरण में बार-बार आने के लिए लालायित रहता है। 
संसाधन 
लगभग हजार वर्गमीटर में निर्मित, निर्माणाधीन और प्रस्तावित भवनों का क्षेत्र है। आवास, आयुर्वेद-अनुसंधान, फार्मेसी, प्रशासनिक, स्वावलंबन, सभागार, ध्यान कक्ष आदि भवनों के स्थान सुरक्षित हैं, जो दिव्य स्वरूप प्रदान करते हैं।

कर्मचारियों हेतु आवास की पूर्ण व्यवस्था है। अतिथिगृह के साथ-साथ यज्ञशाला की व्यवस्था है। खेलकूद तथा व्यायामशाला के लिए आवश्यक सुविधाएँ विद्यमान हैं।

शैक्षणिक संस्थान---
हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों में में निम्नलिखित शिक्षा संस्थान है:-
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की - 30 किमी भूतपूर्व रुड़की इंजीनियरी कॉलेज, जो अब एक आई॰आई॰टी बन चुका है, यह भारत में प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उच्च शिक्षा का एक महत्वपूर्ण संस्थान है जो हरिद्वार से ३० मिनट की दूरी पर रुड़की में स्थित है।
कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग (कोएर) - 14 किमी एक निजी अभियांतिकी संस्थान जो हरिद्वार और रुड़की के बीच राष्ट्रीय महामार्ग 58 पर स्थित है।
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय - 4 किमी कनखल में गंगा नदी के तट पर हरिद्वार-ज्वालापुर बाइपास सड़क पर स्थित।
चिन्मय डिग्री कॉलेज हरिद्वार से 10 किमी दूर स्थित शिवालिक नगर में बसा यह हरिद्वार के विज्ञान कोलेजों में से एक है।
विश्व संस्कृत विद्यालय संस्कृत विश्विद्यालय, हरिद्वार जिसकी स्थापन उत्तराखंड सरकार द्वारा की गई थी विश्व का एकमात्र विश्वविद्यालय है जो पूर्णतः प्राचीन संस्कृत ग्रंथों, पुस्तकों की शिक्षा को समर्पित है। इसके पाठ्यक्रम के अंतर्गत हिन्दू रीतियों, संस्कृति, और परंपराओं की शिक्षा दी जाती है, और इसका भव्य भवन प्राचीन हिन्दू वास्तुशिल्प पर आधारित है।
दिल्ली पब्लिक स्कूल, रानीपुर क्षेत्र के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में से यह एक है जो विश्वव्यापी दिल्ली पब्लिक स्कूल परिवार का भाग है। यह अपनी उत्कृष्ट शैक्षणिक उपलब्धियों, खेलों, पाठ्यक्रमेतर क्रियाकलापों के साथ-साथ सर्वोत्तम सुविधाओं, प्रयोगशालाओं, और शैक्षणिक वातावरन के लिए जाना जाता है।
डी॰ए॰वी सैन्टेनरी पब्लिक स्कूल जगजीत्पुर में स्थित यह विद्यालय शिक्षा के साथ-साथ अपने विद्यार्थियों कों नैतिकता का पाठ भी सिखाता है ताकी यहाँ से निकला हर विद्यार्थी संसार के हर कोने को प्रकाशित कर सके।
केन्द्रीय विद्यालय, बी॰एच॰ई॰एल केन्द्रिय विद्यालय, बी॰एच॰ई॰एल, हरिद्वार के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में से एक है, जिसकी स्थापना 7 जुलाई, 1975 को की गई थी। केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से संबद्धीकृत, इस विद्यालय में प्री-प्राइमरी से 12वीं तक 2,००० से अधिक विद्यार्थी पढ़ते है।


हरिद्वार नगर, हरिद्वार जनपद का मुख्यालय है। यह नगर हिन्दुओं का एक अति प्राचीन तीर्थ एवं धार्मिक स्थल है। संस्कत भाषा तथा हिन्दुओं के अन्य धार्मिक कलापों का भी प्रमुख केन्द्र है। वर्तमान में इस नगर में कुछ उधोगों का विकास हुआ है। यह नगर मेरठ से 141 किमी0 सहारनपुर से 81 किमी0 लखनउ से 494 किमी0 तथा देहरादून से 52 किमी0 पर स्थित है।

नगर की आबादी मुख्यतः चार भागों में विभाजित हैं 1- हरिद्वार 2- ज्वालापुर 3- कनखल 4- भारत हैवी इलैक्ट्रिकल टाउनशिप।

हरिद्वार नगर पश्चिम उत्तर प्रदेश में जडी बूटियों एवं जंगल से प्राप्त लकडी की एक प्रमुख मण्डी है। यह नगर राजकीय राजमार्ग संख्या 45 दिल्ली से प्रारम्भ होकर मेरठ, मुजपफरनगर, रूडकी, हरिद्वार होती हुई भारत तिब्बत सीमा पर स्थित नीतीपास नामक स्थान पर जाकर समाप्त होती है।

जलवायु :-
हरिद्वार की जलवायु उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्र के लगभग समान है जो अत्यन्त स्वास्थ्यप्रद है। मई तथा जून के महीनों में भीषण गर्मी पडती है। नगर का तापमान 1.3 से 41.1 डिग्री सेंटीग्रेट के मध्य रहता है। नगर में पानी की सतह की औसत गहराई 25x35 फीट है।

पर्व :-
गहन धार्मिक महत्व के कारण हरिद्वार में वर्ष भर में कई धार्मिक त्यौहार आयोजित होते हैं जिनमें प्रमुख हैं :- कवद मेला, सोमवती अमावस्या मेला, गंगा दशहरा, गुघल मेला जिसमें लगभग 20-25 लाख लोग भाग लेते हैं।

इस के अतिरिक्त यहाँ कुंभ मेला भी आयोजित होता है बार हर बारह वर्षों में मनाया जाता है जब बृहस्पति ग्रह कुम्भ राशिः में प्रवेश करता है। कुंभ मेले के पहले लिखित साक्ष्य चीनी यात्री, हुआन त्सैंग (602 - 664 ई.) के लेखों में मिलते हैं जो 639 ई. में भारत की यात्रा पर आया था।

भारतीय शाही राजपत्र (इम्पीरियल गज़टर इंडिया), के अनुसार 1812 के महाकुम्भ में हैजे का प्रकोप हुआ था जिसके बाद मेला व्यवस्था में तेजी से सुधार किये गए और, 'हरिद्वार सुधार सोसायटी' का गठन किया गया, और 1903 में लगभग 4,00,000 लोगों ने मेले में भाग लिया। 1980 के दशक में हुए एक कुम्भ में हर-की-पौडी के निकट हुई एक भगदड़ में 600 लोग मारे गए और बीसियों घायल हुए। 1998 के महा कुंभ मेले में तो 8 करोड़ से भी अधिक तीर्थयात्री पवित्र गंगा नदी में स्नान करने के लिए यहाँ आये। 

परिवहन :-
हरिद्वार अच्छी तरह सड़क मार्ग से राष्ट्रीय राजमार्ग 58 से जुड़ा है जो दिल्ली और मानापस को आपस में जोड़ता है। निकटतम ट्रेन स्टेशन हरिद्वार में ही स्थित है जो भारत के सभी प्रमुख नगरों को हरिद्वार से जोड़ता है। निकटतम हवाई अड्डा जौली ग्रांट, देहरादून में है लेकिन नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को प्राथमिकता दी जाती है।

उद्योग :-
जबसे राज्य सरकार की सरकारी संस्था, सिडकुल (उत्तराखंड राज्य ढांचागत और औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड) द्वारा एकीकृत औद्योगिक एस्टेट की स्थापना इस ज़िले में की गई है, तबसे हरिद्वार बहुत तेजी से उत्तराखंड के महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है, जो देशभर के कई महत्वपूर्ण औद्योगिक घरानों को आकर्षित कर रहा है, जो यहाँ विनिर्माण सुविधाओं की स्थापना कर रहे हैं।
हरिद्वार पहले से ही एक संपन्न औद्योगिक क्षेत्र में स्थित है जो बाईपास रोड के किनारे बसा है जहाँ पर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, भेल की मुख्य सहायक इकाइयां स्थापित है जो यहाँ 1964 में स्थापित की गयी थी और आज यहाँ 8,000 से अधिक लोग प्रयुक्त हैं।

कब जाएं- 
वैसे तो हरिद्वार में पर्यटन के लिहाज से साल में कभी भी जाया जा सकता है। लेकिन सर्दियों में यहां भीड़ कम होती है। अक्टूबर से मार्च की अवधि यहां आने के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।

कुछ सावधानियाँ :--
1. अपनी यात्रा के लिए उचित समय चुनें यानि अक्तूबर से मार्च का समय अगर कोई बंदिश नहीं है तो ,यात्रा सुबह शुरू करें तो बहुत बढ़िया |
2. हरिद्वार यात्रा का पूरा आनन्द लेना चाहते हैं तो 4-5 दिन का    कार्यक्रम बनायें ,तभी आप आसपास के दर्शनीय स्थलों का आनंद ले सकते हैं |
3. सामान कम लेकर जाएँ ,कुछ जरुरी दवाईयां अवश्य साथ रखें | 
4. अपनी सुविधानुसार जिस धर्मशाला या होटल में ठहरें वो हर की पौढ़ी के पास हो तो अति उत्तम ,आप जब चाहें गंगा स्नान कर के आ सकते हैं |बच्चों को बाजार में घुमा सकते हैं ,कोई त्यौहार हो तो झाँकियाँ दिखा सकते हैं |
5. सामन किसी के भरोसे छोड़ कर गंगा स्नान को न जाएँ ,वहां पण्डे बैठे हैं उनके पास ही अपना सामान रखें |
6. नहाने के लिए सूती कपड़े ना लेकर जाएँ ,इसके लिए रेशमी कपड़े हों तो बहुत खूब |
7. कहीं भी देवी देवता के दर्शनों में बंदरों से सावधान रहें |
8. साफ़ सफाई का ख़ास ख्याल रखें ,धार्मिक स्थलों को और गंगा को गन्दा होने से बचाएं ,इसमें आपका योगदान अहम् एवं अनिवार्य है |

चतुर्थ दिन 
आज हमारी सुबह 6.20 की वापिसी की गाड़ी थी ,इसलिए सबको 4 बजे उठा दिया गया था और 5 बजे तक सब धर्मशाला के प्रांगन में इक्कठे हो चुके थे | अब धर्मशाला के प्रबंधकों ने पहले से ही कुछ टेम्पो वालों को बोल रखा था वो सब वहां आ गए थे वैसे आपको हर समय टेम्पो उपलब्ध रहते हैं आप आराम से स्टेशन या बस स्टैंड पहुँच सकते हैं | सब टेम्पो में सात सात लोग बैठकर 5.40 तक स्टेशन पहुँच चुके थे | सबने 30-30 रुपये टेम्पो वाले को दिए और प्लेटफार्म नंबर 2 पर पहुँच गए यहाँ हमारी गाड़ी आने वाली थी | जब वहां पहुंचे तो ट्रैक पर कोई बूढा भिखारी शायद मरा पड़ा था इसलिए पुलिस के आने के बाद उसकी लाश वहां से उठाई गई इसलिए गाड़ी चलने में थोड़ी देरी हो गई थी |गाड़ी लगभग 6.40 तक चल पी थी |
       गाड़ी में बैठने के थोड़ी देर बाद ही सब नाश्ता करने लगे थे जो बहुत ही प्यार से धर्मशाला में ही हम सबके लिए पूरियाँ और आचार पैक कर के बाँट दिया गया था | गाड़ी हमारी जन शताब्दी थी और गर्मी अपने चरम पर थी जैसे जैसे दिन बढ़ रहा था गर्मी भी बढती जा रही थी और वैसे भी घर वापिसी में हमेशा थकान ही महसूस होती है और घर पहुँचने की जल्दी भी 
गाड़ी के पहुँचने का समय था 11.30 बजे का लेकिन थोड़ी देरी के कारण गाड़ी पहुंची लगभग 12.30 बजे | वहां से सब मेट्रो स्टेशन पहुंचे और फिर अपने अपने घर कुछ सुनहरी यादों के साथ |

चलिए दोस्तो मिलते हैं एक और यात्रा वृतांत के साथ तब तक सबको राम राम |
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