शनिवार, 26 जुलाई 2014

हरिद्वार यात्रा भाग 3.

दर्शनीय स्थल :--
इस भाग में हम हरिद्वार और उसके आसपास के दर्शनीय स्थलों के बारे जानेंगे |

हर की पौडी:---
यह पवित्र घाट राजा विक्रमादित्य ने पहली शताब्दी ईसा पूर्व में अपने भाई भ्रिथारी की याद में बनवाया था. मान्यता है कि भ्रिथारी हरिद्वार आया था और उसने पावन गंगा के तटों पर तपस्या की थी. जब वह मरे, उनके भाई ने उनके नाम पर यह घाट बनवाया, जो बाद में हरी- की- पौड़ी कहलाया जाने लगा. हर की पौड़ी का सबसे पवित्र घाट ब्रह्मकुंड है. संध्या समय गंगा देवी की हरी की पौड़ी पर की जाने वाली आरती किसी भी आगंतुक के लिए महत्वपूर्ण अनुभव है. स्वरों व रंगों का एक कौतुक समारोह के बाद देखने को मिलता है जब तीर्थयात्री जलते दीयों को नदी पर अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए बहाते हैं. विश्व भर से हजारों लोग अपनी हरिद्वार यात्रा के समय इस प्रार्थना में उपस्थित होने का ध्यान रखते हैं. 
मनसा देवी मंदिर :---
मनसा देवी मंदिर एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है जो हरिद्वार शहर से लगभग 3 किमी दूर स्थित है। यह मंदिर हिंदू देवी मनसा देवी को समर्पित है जो ऋषी कश्यप के दिमाग की उपज है। कश्यप ऋषी प्राचीन वैदिक समय में एक महान ऋषी थे। मनसा देवी, सापों के राजा नाग वासुकी की पत्नी हैं।



मनसा देवी जाने के लिए लोग पैदल या उड़नखटोले से जा सकते हैं लेकिन उड़नखटोले के लिए लगभग दो दो घंटे लाइन में लगना पड़ता है इसलिए लोग सुबह सुबह पैदल ही निकल जाते हैं 
मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। इनके पति जगत्कारु तथा पुत्र आस्तिक जी हैं।
रूप:-
मनसा देवी आस्तिक को गोद में लिए हुए, 10वीँ सदी पाल वंश, बिहार।
मनसा देवी मुख्यत: सर्पों से आच्छादित तथा कमल पर विराजित हैं 7 नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं। कई बार देवी के चित्रों तथा भित्ति चित्रों में उन्हें एक बालक के साथ दिखाया गया है जिसे वे गोद में लिये हैं, वह बालक देवी का पुत्र आस्तिक है।





 यह मंदिर शिवालिक पहाड़ियों के बिल्व पर्वत पर स्थित है और इस मंदिर में देवी की दो मूर्तियाँ हैं।
एक मूर्ती की पांच भुजाएं एवं तीन मुहं है एवं दूसरी अन्य मूर्ती की आठ भुजाएं हैं। 52 शक्तिपीठों(हिंदू देवी सती या शक्ति की पूजा किये जाने वाले स्थल) में से एक यह मंदिर सिद्ध पीठ त्रिभुज के चरम पर स्थित है। यह त्रिभुज माया देवी, चंडी देवी एवं मनसा देवी मंदिरों से मिलकर बना है।
          इस मंदिर में भ्रमण के दौरान भक्त एक पवित्र वृक्ष के चारों ओर एक धागा बांधते हैं एवं भगवान् से अपनी मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना करते हैं। मनोकामना पूर्ण होने के बाद वृक्ष से इस धागे को खोलना आवश्यक है। पर्यटक इस मंदिर तक केबल कार द्वारा पहुँच सकते हैं। केबल कार यहाँ ‘देवी उड़नखटोला’ के नाम से प्रसिद्ध है।
मंदिर के खुलने का समय : सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक है और 12 बजे से 2 बजे तक भोजन के लिए मंदिर बंद रहता है |



उड़न खटोला का समय :-
गर्मी में :
अप्रैल से अक्तूबर ... सुबह 7 बजे से रात 8 बजे तक 
सर्दी में :
नवम्बर से मार्च ......सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक 
किराया :- दोनों तरफ का केबल कार का किराया 65 रुपये और एक तरफ का किराया 45 रुपये है |

चढाई के रास्ते में कई स्कूटर या बाइक वाले भी 50 या 70 रुपये लेकर एक एक सवारी को दरबार तक छोड़ देते हैं |
मनसा देवी से जुड़ी मान्यताएं :--
महाभारत:-
जन्मेजय का सर्पेष्ठी यज्ञ
पाण्डुवंश में पाण्डवों में से एक धनुर्धारी अर्जुन और उनकी द्वितीय पत्नि सुभद्रा जो श्री कृष्ण की बहन हैं, उनके पुत्र अभिमन्यु हुआ जो महाभारत के युद्ध में मारा गया। अभिमन्यु का पुत्र परीक्षित हुआ, जिसकी मृत्यु तक्षक सर्प के काटने से हुई। परीक्षित पुत्र जन्‍मेजय ने अपने छ: भाइयों के साथ प्रतिशोध में सर्प जाति के विनाश के लिये सर्पेष्ठी यज्ञ किया। वासुकी ने अपनी बहन मनसा का विवाह किया तथा उसके पुत्र आस्तिक नें सर्पों को यज्ञ से बचाया।
राजा युधिष्ठिर ने भी माता मानसा की पूजा की थी जिसके फल स्वरूप वह महाभारत के युद्ध में विजयी हुए। जहाँ युधिष्ठिर ने पूजन किया वहाँ सालवन गाँव में भव्य मंदिर का निर्माण हुआ।
पुराण:-
अलग अलग पुराणों में मनसा की अलग अलग किंवदंती है। पुराणों में बताया गया है कि इनका जन्म कश्यप के मस्तिष्क से हुआ तथा मनसा किसी भी विष से अधिक शक्तिशाली थी इसलिये ब्रह्मा ने इनका नाम विषहरी रखा।
विष्णु पुराण:-
विष्णु पुराण के चतुर्थ भाग में एक नागकन्या का वर्णन है जो आगे चलकर मनसा के नाम से प्रतलित हुई।

चंडी देवी मंदिर :--
चंडी देवी मंदिर नील पर्वत के शिखर पर स्थित है। यह देश के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। यह मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है एवं इसे कश्मीर के तत्कालीन शासक द्वारा वर्ष 1929 में बनवाया गया था। हालांकि ऐसा कहा जाता है कि मंदिर में जो मूर्ति है उसे महान संत आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में स्थापित किया था।



रेलवे स्टेशन से करीब छह किलोमीटर दूरी पर हरिद्वार-नजीबाबाद रोड पर शिवालिक पर्वत माला के एक शिखर पर स्थापित इस मंदिर के लिए पैदल और उडऩ खटोले से जाने की व्यवस्था है। स्टेशन से मंदिर के रास्ते के लिए ऑटो, टेम्पो, टैक्सी, साइकिल रिक्शा और तांगा उपलब्ध हैं|
         चंडी घाट से तीन किलोमीटर की ट्रैकिंग है या उड़न खटोले से भी यहाँ जाया जा सकता है | पूरे हरिद्वार में कहीं भी आप ठहरे हैं टेम्पो ,टैक्सी आपको मिल जाते हैं जो आपके गंतव्य तक पहुंचाते हैं |
         धार्मिक मान्यता है कि जहां मनसादेवी होंगी, वहां चंडी देवी का होना अनिवार्य है। पौराणिक कथाओं के अनुसार तंत्र-मंत्र की सिद्धिरात्री चंडीदेवी ने इसी स्थान पर शुंभ-निशुंभ नामक असुरों का वध किया था। शिवालिक पर्वत श्रृंखला पर स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर के पास शुंभ और निशुंभ नाम के दो पर्वत आज भी हैं। मंदिर में मां काली की प्रतिमा विराजमान है। इसके पास ही हनुमान जी की माता अंजनी देवी का मंदिर भी स्थित है। मां चंडी देवी की रात में विशेष पूजा होती है। भक्तगण अपनी खास पूजा के लिए मंदिर समिति से संपर्क इस खास अनुष्ठान को अपने तथा अपने परिवार के लिए भी करा सकते हैं। नवरात्रों में इस विशेष पूजा का खास महत्व है। इसके मद्देनजर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। विशेष पूजा करने वालों की संख्या ज्यादा होती है। मान-मनौती के लिए मंदिर की बड़ी आस्था है।



मंदिर में मां की चुनरी को बांध मनौती मांगने की परंपरा है। इसकी बड़ी मान्यता है। चुनरी बांध कर मन की इच्छा पूर्ति की देवी से प्रार्थना करने पर वो अवश्य पूरी होती है। मनौती पूरी होने पर देवी दर्शन तत्पश्चात चुनरी खोलने की भी परंपरा है। नवरात्रों में इसका विशेष महत्व है।
माया देवी मंदिर :---

हरिद्वार की रक्षा के लिए एक अद्भुत त्रिकोण विद्यमान है। इस त्रिकोण के दो बिंदु पर्वतों पर मनसा और चंडी के रूप में स्थित है। त्रिकोण उल्टा है और उसका शिखर धरती पर है। उसी अधोमुख शिखर पर भगवती माया आसीन हैं। अधोमुख त्रिभुज के शिखर पर स्थापित माया देवी के नाम पर ही हरिद्वार का प्राचीन नाम मायापुरी पड़ा। यह 52 शक्तिपीठों में से एक है जो हिंदू देवी सती या शक्ति द्वारा पवित्र किया गया भक्ति स्थल है। यह मंदिर हिंदू देवी अधिष्ठात्री को समर्पित है एवं इसका इतिहास 11वीं शताब्दी से उपलब्ध है। ब्रह्मपुराण में सप्त पुरियोंको मोक्षदायिनी बताया है। इनमें मायापुरी भी शामिल है।



       प्रचलित मान्यता के अनुसार, एक बार दक्ष प्रजापति ने हरिद्वार स्थित कनखल में यज्ञ किया। यज्ञ में शिव शंकर के अपमान से कुपित होकर माता सती ने हवनकुंड में आहुति दे दी। इस पर शिव शंकर व्यधित होकर पत्‍‌नी के वियोग में खो गए। कहते हैं कि वियोग में भोले शंकर सती के मृत शरीर को लेकर जगह-जगह भटकने लगे।

इसपर विष्णु भगवान ने शिव शंकर के वियोग को समाप्त करने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के मृत काया के 51 हिस्से कर दिए। ये हिस्से जहां-जहां गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मान्यता है कि माया देवी मंदिर में सती की मृत काया की नाभि गिरी थी और यह जगह माया देवी के रूप में विख्यात हुई। 




प्राचीन काल से माया देवी मंदिर में देवी की पिंडी विराजमान है। 18वीं सदी में इस मंदिर में देवी की मूर्तियां की भी प्राण-प्रतिष्ठा की गई। मंदिर के बगल में आनंद भैरव का मंदिर भी है। पर्व-त्योहारों के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु माया देवी मंदिर के दर्शन करने को पहुंचते हैं।

इस मंदिर का अनेक बार जीर्णोद्धार किया गया। वर्तमान समय में मंदिर का प्रबंध जूना-भैरव अखाड़ा देखता है। मंदिर में सायं कालीन आरती देखने योग्य होती है। विशेषकर गुजरात, राजस्थान, पश्चिमी बंगाल और उड़ीसा से आने वाले यात्री माया देवी का दर्शन अवश्य करते हैं। 

सप्तऋषि आश्रम:-
इस आश्रम के सामने गंगा नदी सात धाराओं में बहती है इसलिए इस स्थान को सप्त सागर भी कहा जाता है। माना जाता है कि जब गंगा नदी बहती हुई आ रही थीं तो यहाँ सात ऋषि गहन तपस्या में लीन थे। गंगा ने उनकी तपस्या में विघ्न नहीं डाला और स्वयं को सात हिस्सों में विभाजित कर अपना मार्ग बदल लिया। इसलिए इसे 'सप्‍त सागर' भी कहा जाता है।

दक्ष महादेव मंदिर:-
यह प्राचीन मंदिर नगर के दक्षिण में स्थित है। सती के पिता राजा दक्ष की याद में यह मंदिर बनवाया गया है। किवदंतियों के अनुसार सती के पिता राजा दक्ष ने यहाँ एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। यज्ञ में उन्होंने शिव को नहीं आमन्त्रित किया। अपने पति का अपमान देख सती ने यज्ञ कुण्ड में आत्मदाह कर लिया। इससे शिव के अनुयायी गण उत्तेजित हो गए और दक्ष को मार डाला। बाद में शिव ने उन्हें पुनर्जीवित कर दिया।





परमेश्वर महादेव मंदिर :-
यह मंदिर हरिद्वार से लगभग 4 कि.मी. दूर है, यहां पारे से बना एक पवित्र शिवलिंग है।

पवन धाम मंदिर :-
शहर से लगभग 2 कि.मी. दूर पवन धाम मंदिर है। उत्कृष्ट आईनों और शीशे पर किए गए कार्य के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर में व्यापक रूप से अलंकृत मूर्तियां हैं। इसे शीशे वाला मंदिर भी कहते हैं | 

लाल माता मंदिर :-
यह मंदिर जम्मू-कश्मीर में स्थित वैष्णों देवी मंदिर का प्रतिरूप है। यहां एक नकली पहाड़ी और बर्फ से जमाया हुआ शिवलिंग है जो अमरनाथ के शिवलिंग का प्रतिरूप है।

यहां अनेक दर्शनीय मंदिर हैं जिनमें दक्ष महादेव मंदिर, भारत माता मंदिर और चंदा देवी प्रमुख हैं। जय राम आश्रम, आनंदमयी मां आश्रम, सप्त ऋषि आश्रम और परमार्थ आश्रम अन्य दर्शनीय स्थल हैं।

कनखल :-
कनखल, हरिद्वार शहर से बिलकुल सटा हुआ है। कनखल के विशेष आकर्षण प्रजापति मंदिर, सती कुंड एवं दक्ष महादेव मंदिर हैं। कनखल आश्रमों तथा विश्व प्रसिद्ध गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के लिए भी जाना जाता है।
कनखल का पौराणिक महत्त्व:-
महाराजा शिव की राजधानी कनखल (हरिद्वार) में थी। शिव से सती का सती होना सहन नहीं हुआ ,शिव ने वीरभद्र को बुलाया और कहा कि मेरी गण सेना का नेतृत्व करो और दक्ष का यज्ञ नष्ट कर दो. वीरभद्र शिव के गणों के साथ गए और यज्ञ को नष्ट कर दक्ष का सर काट डाला।

      कनखल में सभी हिन्दू दाह संस्कार के बाद अस्थियाँ प्रवाह करते हैं जिससे ऐसा माना जाता है की आत्मा की मुक्ति होती है |


ऋषिकेश :--
ऋषिकेश हरिद्वार से लगभग 25 किलोमीटर दूर है ,यहाँ के लिए आपको आराम से टेम्पो मिल जाते हैं जो आपको 45-50 मिनट में ही ऋषिकेश पहुंचा देते हैं | आप सीधे ऋषिकेश भी जा सकते हैं | या हरिद्वार यात्रा के साथ भी इसका आनंद ले सकते हैं |





कैसे जाएं----
वायुमार्ग-
ऋषिकेश से 18 किमी. की दूरी पर देहरादून के निकट जौली ग्रान्ट एयरपोर्ट नजदीकी एयरपोर्ट है। एयर इंडिया, किंगफिशर, जेट एवं स्पाइसजेट की फ्लाइटें इस एयरपोर्ट को दिल्ली से जोड़ती है।
रेलमार्ग-
ऋषिकेश का नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है जो शहर से 5 किमी. दूर है। ऋषिकेश देश के प्रमुख रेलवे स्टेशनों से जुड़ा हुआ है।
सड़क मार्ग-
दिल्ली के कश्मीरी गेट से ऋषिकेश के लिए डीलक्स और निजी बसों की व्यवस्था है। राज्य परिवहन निगम की बसें नियमित रूप से दिल्ली और उत्तराखंड के अनेक शहरों से ऋषिकेश के लिए चलती हैं।

हिमालय का प्रवेश द्वार, ऋषिकेश जहाँ पहुँचकर गंगा पर्वतमालाओं को पीछे छोड़ समतल धरातल की तरफ आगे बढ़ जाती है। ऋषिकेश का शांत वातावरण कई विख्यात आश्रमों का घर है। 
ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेशद्वार माना जाता है। कहा जाता है कि इस स्थान पर ध्यान लगाने से मोक्ष प्राप्त होता है। हर साल यहाँ के आश्रमों के बड़ी संख्या में तीर्थयात्री ध्यान लगाने और मन की शान्ति के लिए आते हैं। विदेशी पर्यटक भी यहाँ आध्यात्मिक सुख की चाह में नियमित रूप से आते रहते हैं। ऋषिकेश के दर्शनीय स्थल 
देखे बिना आप आ ही नही सकते |
लक्ष्मण झूला :-
गंगा नदी के एक किनार को दूसर किनार से जोड़ता यह झूला नगर की विशिष्ट की पहचान है। इसे 1939 में बनवाया गया था। कहा जाता है कि गंगा नदी को पार करने के लिए लक्ष्मण ने इस स्थान पर जूट का झूला बनवाया था। झूले के बीच में पहुंचने पर वह हिलता हुआ प्रतीत होता है। 450 फीट लंबे इस झूले के समीप ही लक्ष्मण और रघुनाथ मंदिर हैं। झूले पर खड़े होकर आसपास के खूबसूरत नजारों का आनंद लिया जा सकता है। लक्ष्मण झूला के समान राम झूला भी नजदीक ही स्थित है। यह झूला शिवानंद और स्वर्ग आश्रम के बीच बना है। इसलिए इसे शिवानंद झूला के नाम से भी जाना जाता है।ऋषिकेश मैं गंगाजी के किनारे की रेट बड़ी ही नर्म और मुलायम है ,इस पर बैठने से यह माँ की गोद जैसी स्नेहमयी और ममतापूर्ण लगती है,यहाँ बैठकर दर्शन करने मात्र से ह्रदय मैं असीम शांति और रामत्व का उदय होने लगता है ...






राम झूला :-
राम झूला उत्तराखंड राज्य के ऋषिकेश शहर में शिवानंद और स्वर्ग आश्रम के बीच बना है। इसलिए इसे 'शिवानंद झूला' के नाम से भी जाना जाता है।
शिवानंद आश्रम के सामने एक झूलेनुमा पुल बना हुआ है, जिसे राम झूले के नाम से जाना जाता हैं। राम झूला लक्ष्मण झूला के नज़दीक स्थित है।
स्वर्गाश्रम क्षेत्र में जाने हेतु राम झूला गंगा के उस पार से इस पार ले जाने का रास्ता है। राम झूला भार भी झेल सकता है। दुपहिया वाहन इसके ऊपर से अक्सर निकलते देखे जा सकते हैं। राम झूले (पुल) पर जब लोग चलते है तो यह झूलता हुआ प्रतीत होता है। हिचकोले खाते हुए, राम झूले के ऊपर से नीचे बह रही गंगा का विहंगम दृश्य का आनंद लिया जा सकता है।

चित्र:Ram-Jhula-1.jpg

त्रिवेणी घाट :-
ऋषिकेश में स्नान करने का यह प्रमुख घाट है जहां प्रात: काल में अनेक श्रद्धालु पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं। कहा जाता है कि इस स्थान पर हिन्दु धर्म की तीन प्रमुख नदियों गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। इसी स्थान से गंगा नदी दायीं ओर मुड़ जाती है। शाम को होने वाली यहां की आरती का नजारा बेहद आकर्षक होता है।




स्वर्ग आश्रम-
स्वामी विशुद्धानन्द द्वारा स्थापित यह आश्रम ऋषिकेश का सबसे प्राचीन आश्रम है। स्वामी जी को काली कमली वाले नाम से भी जाना जाता था। इस स्थान पर बहुत से सुन्दर मंदिर बने हुए हैं। यहां खाने पीने के अनेक रस्तरां हैं जहां सिर्फ शाकाहारी भोजन ही परोसा जाता है। आश्रम की आसपास हस्तशिल्प के सामान की बहुत सी दुकानें हैं।




नीलकंठ महादेव मंदिर-
लगभग 5500 फीट की ऊंचाई पर स्वर्ग आश्रम की पहाड़ी की चोटी पर नीलकंठ महादेव मंदिर स्थित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मंथन से निकला विष ग्रहण किया गया था। विषपान के बाद विष के प्रभाव के से उनका गला नीला पड़ गया था और उन्हें नीलकंठ नाम से जाना गया था। मंदिर परिसर में पानी का एक झरना है जहां भक्तगण मंदिर के दर्शन करने से पहले स्थान करते हैं।



भरत मंदिर-

यह ऋषिकेश का सबसे प्राचीन मंदिर है जिसे 12 शताब्दी में आदि गुरू शंकराचार्य ने बनवाया था। भगवान राम के छोटे भाई भरत को समर्पित यह मंदिर त्रिवेणी घाट के निकट ओल्ड टाउन में स्थित है। मंदिर का मूल रूप 1398 में तैमूर आक्रमण के दौरान क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। हालांकि मंदिर की बहुत सी महत्वपूर्ण चीजों को उस हमले के बाद आज तक संरक्षित रखा गया है। मंदिर के अंदरूनी गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा एकल शालीग्राम पत्थर पर उकेरी गई है। आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रखा गया श्रीयंत्र भी यहां देखा जा सकता है।

कैलाश निकेतन मंदिर-
लक्ष्मण झूले को पार करते ही कैलाश निकेतन मंदिर है। 12 खंड़ों में बना यह विशाल मंदिर ऋषिकेश के अन्य मंदिरों से भिन्न है। इस मंदिर में सभी देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं।

वशिष्ठ गुफा-
ऋषिकेश से 22 किमी. की दूरी पर 3000 साल पुरानी वशिष्ठ गुफा बद्रीनाथ-केदारनाथ मार्ग पर स्थित है। इस स्थान पर बहुत से साधुओं विश्राम और ध्यान लगाए देखे जा सकते हैं। कहा जाता है यह स्थान भगवान राम और बहुत से राजाओं के पुरोहित वशिष्ठ का निवास स्थल था। वशिष्ठ गुफा में साधुओं को ध्यानमग्न मुद्रा में देखा जा सकता है। गुफा के भीतर एक शिवलिंग भी स्थापित है।

गीता भवन-
राम झूला पार करते ही गीता भवन है जिसे 1950 ई. में श्रीजयदयाल गोयन्काजी ने बनवाया गया था। यह अपनी दर्शनीय दीवारों के लिए प्रसिद्ध है। यहां रामायण और महाभारत के चित्रों से सजी दीवारें इस स्थान को आकर्षण बनाती हैं। यहां एक आयुर्वेदिक डिस्पेन्सरी और गीताप्रेस गोरखपुर की एक शाखा भी है। प्रवचन और कीर्तन मंदिर की नियमित क्रियाएं हैं। शाम को यहां भक्ति संगीत की आनंद लिया जा सकता है। तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए यहां सैकड़ों कमरे हैं।

रिवर राफ्टिंग -
ऋषिकेश को रिवर राफ्टिंग का मक्का कहा जाता है और यहां हर साल हजारों एडवेंचर लवर राफ्टिंग के लिए पहुंचते हैं. लेकिन न तो सरकार अब तक चेती है और न राफ्टिंग कारोबारी सुरक्षा के पूरे उपाय कर पाए हैं. अप्रशिक्षित और युवा गाइडों के साथ कामचलाऊ सुरक्षा उपकरणों के सहारे देसी-विदेशी पर्यटकों की जान को खतरे में डाला जा रहा है| गर्मी का मौसम शुरू होते ही पर्यटक व्हाइट वॉटर राफ्टिंग के लिए आते हैं| 
1984-85 में जब ऋषिकेश में राफ्टिंग का काम शुरू हुआ, तब यहां सिर्फ 2-3 कंपनियां थीं और सिर्फ विदेशी पर्यटक ही राफ्टिंग करने के लिए आते थे | लेकिन आज यहां 140 रजिस्टर्ड राफ्टिंग कंपनियां और करीब 500 राफ्टिंग बुकिंग काउंटर हैं.’’ राफ्टिंग की हरसत इसलिए भी एडवेंचर लवर्स को खींच लाती है क्योंकि यहां आठ महीने का सबसे लंबा राफ्टिंग सीजन होता है.




खरीददारी :-
ऋषिकेश में हस्तशिल्प का सामान अनेक छोटी दुकानों से खरीदा जा सकता है। यहां अनेक दुकानें हैं जहां से साड़ियों, बेड कवर, हैन्डलूम फेबरिक, कॉटन फेबरिक आदि की खरीददारी की जा सकती है। ऋषिकेश में सरकारी मान्यता प्राप्त हैन्डलूम शॉप, खादी भंडार, गढ़वाल वूल और क्राफ्ट की बहुत सी दुकानें हैं जहां से उच्चकोटि का सामान खरीदा जा सकता है |
ऋषिकेश देखने के बाद सभी धर्मशाला पहुँच चुके थे | अगले भाग में जानते हैं हरिद्वार के कुछ और आकर्षण ...

हरिद्वार यात्रा भाग 4. क्रमशः ...

शनिवार, 19 जुलाई 2014

हरिद्वार यात्रा भाग 2.

दूसरा दिन 
दूसरा दिन शुरू हुआ 5.30 बजे शाखा के कार्यक्रम से जिसमें हलका फुल्का व्यायाम करवाया गया और उसके बाद चाय तैयार थी जो पीना चाहे | इसके बाद लगभग 6.30 बजे सभी गंगा स्नान के लिए हर की पौढ़ी की तरफ चल दिए यहाँ सुविधा से जाने के लिए टेम्पो जो 10 रुपये सवारी लेते हैं एक अच्छा साधन है अगर भीड़ का समय नही है तो यह आपको हर की पौड़ी के बाहर ही उतार देते हैं और अगर भीड़ का समय है तो आपको भीमगौडा पर ही रोक दिया जाता है उसके आगे के लिए आप दोबारा रिक्शा कर सकते हैं |  
हर की पौड़ी :---
वह स्थान जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी थी उसे हर-की-पौडी पर ब्रह्म कुंड माना जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ है 'ईश्वर के पवित्र पग'। हर-की-पौडी, हरिद्वार के सबसे पवित्र घाट माना जाता है और पूरे भारत से भक्तों और तीर्थयात्रियों के जत्थे त्योहारों या पवित्र दिवसों के अवसर पर स्नान करने के लिए यहाँ आते हैं। यहाँ स्नान करना मोक्ष प्राप्त करने के लिए आवश्यक माना जाता है।




यहाँ से हमने दोबारा रिक्शा किया और पहुँच गए हर की पौड़ी के बाहर 
हर की पौड़ी पर पहुँचने के लिए काफी सारी सीड़ियाँ नीचे उतरनी पड़ती हैं यहाँ हर सीढ़ी पर भिखारी अपना कब्ज़ा किये बैठे हैं और गन्दगी तो बेशुमार है यहाँ प्रशासन की ओर से कमी अभी भी खलती है यहाँ कोई कूड़ादान नजर नही आता है यहाँ खाली दूध की थैलियाँ, फूल पत्ते और बाकी कचरा फैंका जा सके |
कुछ सीडियां उतर कर जूता स्टैंड है यहाँ आप अपने जूते जमा कराकर हर की पौड़ी पर स्नान के लिए जा सकते हैं दो जूता घर हैं दोनों तरफ से आने वालों के लिए लेकिन जूते अगर ज्यादा हों तो इनके पास कोई बोरी या थैले की सुविधा नही है और आपका सामान वगेरह रखने की कोई सुविधा यहाँ नहीं है जो लोग अकेले आते हैं वो घाट पर बैठे किसी भी पण्डे के पास अपना कीमती सामान रख सकते हैं जिसके वो निसंदेह पैसे लेते हैं मुफ्त सुविधा कोई नहीं है |
हर की पौड़ी पर ही एक महिला घाट है जो बस नाम मात्र का है जिसमें पहले रेत भरी रहती थी अब उसमें पानी ही नही है इसलिए सब महिलाएं बाहर नहाना ही पसंद करती हैं | महिला घाट के अन्दर कुछ तख़्त पड़े हैं जिन पर मोटी मोटी पंडिताईन बैठी हैं जो आपका सामान रखने का आपसे पैसा लेती हैं | यहाँ महिलाएं सिर्फ कपडे बदलने के लिए आती हैं |
हमने सबने बारी बारी स्नान किया और फिर बाहर आ गए और दोबारा अपने जूते वापिस लेकर हम सीड़ियाँ चढकर बाहर पहुँच गए और फिर हमने यहाँ से टेम्पो किया धर्मशाला के लिए जो आने के लिए तो प्रति सवारी दस रुपये किराया ले रहा था लेकिन वापिसी में प्रति सवारी बीस रुपये किराया लिया गया | खैर हम सब 8 बजे तक धर्मशाला पहुँच गए थे | 
 8.30 बजे नाश्ते के लिए जाना था इसलिए सब दोबारा स्नान कर तैयार होने चले गए क्योंकि गंगा नहाने के बाद कपड़ों में रेत आ जाती है | इसके बाद नाश्ता किया गया नमकीन और मीठे दलिए के साथ |इसके बाद हर कोई स्वतंत्र था यहाँ भी कोई जाना चाहे | कुछ लोग नीलकंठ चले गए कुछ मनसा देवी ,कुछ ऋषिकेश और हमारा ग्रुप तैयार हुआ पतंजलि योगपीठ जाने के लिए |
पतंजलि योगपीठ यहाँ से लगभग 25 किलोमीटर दूर है इसलिए नाश्ता करने के बाद लगभग 9.30 बजे हम सब निकल पड़े ताकि दोपहर के भोजन तक हम वापिस धर्मशाला में आ सकें |
        यहाँ जाने के लिए हमने दो टेम्पो किये क्योंकि एक में सात लोग बैठ सकते हैं सभी लोग इसमें बैठ कर निकल पड़े वहां पहुँचने में हमें लगभग 45 मिनट लगे |टेम्पो वाले ने वहां जाने के लिए प्रति सवारी 30 रुपये लिए |



यहाँ पहुंचने के बाद थोडा घूम कर हमने इसे देखा फिर जलपान के लिए पहुंचे इसकी कैंटीन में जिसका नाम है 'अन्नपूर्णा ' यहाँ की शुद्ध घी से निर्मित जलेबी का स्वाद आप चखे बिन नहीं रह सकते | सबने यहाँ फ्रूट चाट ,गोलगप्पे, जलेबी और चाट पकौड़ी खाई सभी स्वादिष्ट बना हुआ था यहाँ शुद्ध घी से निर्मित मिठाइयाँ भी मिलती हैं |



  इसके बाद हम दवाइयां लेने पहुंचे जिसको जो भी सामान चाहिए था लिया और फिर वापिस पहुंचे टेम्पो वाले के पास जो हमारा इन्तजार कर रहे थे क्योंकि धूप बहुत अधिक थी इसलिए कोई भी और घूमने के लिए तैयार नहीं था |
वापिसी में काफी गर्मी थी और ट्रैफिक जाम भी बहुत था इसलिए थोड़ा देर से पहुंचे हम धर्मशाला | फिर थोडा विश्राम करने के बाद भोजन का समय हो चूका था इसलिए हम सबने भोजन किया और अपने अपने कमरे में चले गए |
शाम के समय जो नील कंठ गए थे उनको काफी देर हो गई आने में और इतनी गर्मी के कारण कहीं भी जाने का मन नहीं हुआ इसलिए हम धर्मशाला के बाहर ही कुर्सी लगा कर बैठ गए और ठंडी तजि हवा का आनन्द लिया | कुछ लोग उस समय हर की पौढ़ी और कुछ पास वाले घाट पर नहाने के लिए चले गए |
अब सब अपने अपने कमरे में चले गए आराम करने | रात को 9 बजे फिर सभी भोजन के लिए पहुँचे |



उसके बाद बाहर बरामदे में ही भजन कीर्तन का कार्यक्रम चलता रहा | उसके बाद सभी सोने के लिए चले गए |


तीसरा दिन 
आज सुबह सभी उठकर अपने कार्यों से निवृत होकर नाश्ता करने चले गए | उसके बाद लगभग 9 बजे सभी अपने अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए | हम कुछ लोगों ने शांतिकुंज जाने का कार्यक्रम बनाया जो धर्मशाला से केवल 10-12 किलोमीटर की दूरी पर ही था ,इसलिए सबने टेम्पो ले लिया और 10..10 रुपए देकर वहां पहुँच गए |
शांतिकुंज :-
रेलवे स्टेशन/बस स्टैण्ड से हर की पौड़ी पहुंचने के बाद यहाँ से बाई पास रोड़ में सूखी नदी तथा भारतमाता मन्दिर पार करके उसी मार्ग पर शांतिकुंज स्थित है। यहाँ पर कार से पँहुचने में 15 मिनट, रिक्शा से पँहुचने में 30 मिनट, एवं पैदल पँहुचने में 45 मिनट लगते है। 
संस्थान की स्थापना :
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी शर्मा द्वारा इस आश्रम की स्थापना 1971में की गई थी।
अंदर जाने से पहले प्रवेश सूचना देनी होती है रजिस्टर में लिख कर कितने लोग जा रहे हैं | बहुत ही साफ़ सफाई और सुव्यवस्था का संगम है शांतिकुंज ,यहाँ बहुत सारे लोग अपनी वृद्ध अवस्था में आकर रहते हैं ,यहाँ रहने की बहुत ही सुंदर व्यवस्था है | जैसे अंदर पूरा एक क़स्बा बस्ता है | इसके अंदर ही दो कैंटीन हैं एक कैंटीन में कुछ सस्ता सामान मिलता है इसके साथ ही भोजनालय है यहाँ पर दिन में दो बार मुफ्त भोजन की व्यवस्था है यहाँ पर कुछ लोग आकर दान रूप में भोजन वितरण भी करते हैं | अंदर ही आयुर्वेदिक दवाइयां जो यहाँ निर्मित होती हैं उचित मूल्य पर मिलती हैं | बहुत सारे विभाग हैं यहाँ ,जिनमे लोग रहते हैं ,उनको ऋषिओं के नाम पर नाम दिया गया है | यहाँ जूते रखने की व्यवस्था बहुत ही उत्तम है | शांति कुञ्ज की कुछ झलकियाँ ...





जैसे की गर्मी बहुत अधिक हो रही थी इसलिए हमने जल्दी वापिस आना ही उचित समझा | वापिस आकर हमने दोपहर का भोजन लिया और वापिस अपने अपने कमरे में चले गए | 
शाम को गंगा आरती देखने का प्रोग्राम था जिसे देखने के लिए लोग बहुत दूर दूर से हर की पौढ़ी पर पहुंचते हैं | क्योंकि आरती का समय 7 बजे के बाद का रहता है और हमें बाजार से कुछ सामान भी लेना था इसलिए हम 5 बजे तक धर्मशाला से निकल चुके थे ,क्योंकि भीमघोड़ा सड़क पर चप्पल की बहुत अच्छी दुकाने हैं यहाँ मोल भाव करके बहुत मजबूत चप्पलें आप ले सकते हैं |उसके बाद हमने दोबारा रिक्शा किया हर की पौढ़ी के लिए |

आरती शुरू होने वाली थी ,इसलिए सबको गंगा किनारे बिठाने के लिए वहां काफी कार्यकर्त्ता तैनात थे वहां प्लास्टिक की पन्निओं की बनी चादरें बिछा दी गई थीं ,जिस पर सब बैठ गए आरती का आनंद लेने के लिए और लोग जो आते रहे सब पीछे खड़े होते गए | तभी मन्त्र उच्चारण के साथ शुरू हुई गंगा आरती जिसमें 11 या 13 पंडितों  ने भाग लिया ,रात होने को थी और कल कल बहती गंगा के किनारे जगमगा उठे थे लहरों पर भी दिए सवार होकर निकल पड़े थे दूसरे गंतव्य को सभी अपलक इस दृश्य को अपने अपने कैमरे में कैद करने लग गए थे | जो सेवक तैनात थे सबकी व्यवस्था  करने में लगे थे ,सबके हाथ में एक एक पुस्तिका थी यानि दान पर्ची ,जो आरती के उपलक्ष्य में जलाये जाने वाले दिओं के लिए दान स्वरुप ली जा रही थी | आइये आपको ले चलें गंगा किनारे आरती दर्शन के लिए कुछ झलकियों के साथ ....






आरती से फ्री होकर हम सब वापिस धर्मशाला के लिए चले ,वापिसी में बहुत मुश्किल से रिक्शा मिली भीमगौडा तक वो भी दुगने पैसों के साथ और वहां से आगे कोई टेम्पो 200 रुपये से कम जाने को तैयार नही हो रहा था जिसकी आने की कीमत हमने सिर्फ 70 रुपये दी थी | वहां कोई आपको सुनने वाला नही है | बहुत मुश्किल से हम धर्मशाला पहुंचे और खाना खाकर अपने अपने कमरे में चले गए |

हरिद्वार यात्रा भाग 3.क्रमशः ....

बुधवार, 25 जून 2014

हरिद्वार यात्रा भाग 1.

दोस्तों वादे के अनुसार एक और धार्मिक यात्रा वृतांत के साथ आप सबके समक्ष हाजिर हूँ पहले हरिद्वार यात्रा का थोड़ा सा जिक्र मुल्तान ज्योत महोत्सव के तौर पर कर चुकी हूँ जिसमें मुख्य बिंदु ज्योत महोत्सव के ही रहे ,अब लेकर आई हूँ हरिद्वार यात्रा संस्मरण और उसके आसपास के दर्शनीय स्थल तो चलिए बढ़ते हैं अपने पहले पड़ाव की ओर ....
हरिद्वार 
पवित्र गंगा नदी के किनारे बसे 'हरिद्वार' का शाब्दिक अर्थ है- 'हरि तक पहुँचने का द्वार'। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, हरिद्वार वह स्थान है जहाँ अमृत की कुछ बूँदें भूल से घडे से गिर गयीं जब खगोलीय पक्षी गरुड़ उस घडे को समुद्र मंथन के बाद ले जा रहे थे। चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरीं, और ये स्थान हैं:- उज्जैन, हरिद्वार, नासिक, और प्रयाग| 

हरिद्वार  एक अंतरराष्ट्रीय  तीर्थ स्थान  होने के कारण यहाँ साल भर   लाखों करोड़ों  की संख्या में श्रद्धालू देश विदेश से आते है |





स्थिति :---
हरिद्वार, हरिद्वार जिला, उत्तराखण्ड, भारत में एक पवित्र नगर और नगर निगम बोर्ड है। हिन्दी में, हरिद्वार का अर्थ हरि "(ईश्वर)" का द्वार होता है। हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है। हरिद्वार जिला, सहारनपुर डिवीजनल कमिशनरी के भाग के रूप में २८ दिसंबर १९८८ को अस्तित्व में आया। २४ सितंबर १९९८ के दिन  उत्तर प्रदेश का पुनर्गठन किया गया , और इस प्रकार ९ नवंबर, २०००, के दिन हरिद्वार भारतीय गणराज्य के २७वें नवगठित राज्य उत्तराखंड (तब उत्तरांचल), का भाग बन गया।
भूगोलिक स्थिति :---
३१३९ मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गौमुख (गंगोत्री हिमनद) से २५३ किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में गंगा के मैदानी क्षेत्रो में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को गंगाद्वार के नाम सा भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ पर गंगाजी मैदानों में प्रवेश करती हैं।
पहुँचने के साधन :---
हरिद्वार देश के विभिन्न स्थलों से रेल एवं सड़क मार्ग से जुड़ा है। 
रेल द्वारा :-
दिल्ली से हरिद्वार तक की दूरी रेल द्वारा लगभग 225 किलोमीटर है |
हरिद्वार के लिए दिल्ली से लगभग 20 गाड़ियाँ निकलती हैं जिसका आम किराया 92 रुपये से 160 रुपये तक है थोड़ी सुविधा के साथ इसका किराया लगभग 466 रुपये और 661 रुपये है और थोड़ी और ज्यादा सुविधा के साथ इसका किराया 1083 से लेकर 1103 रुपये तक है |
बस द्वारा :-
बस से हरिद्वार की दूरी लगभग 208 किलोमीटर है डीटीसी बस सर्विस सुबह 7.30 बजे से शुरू होकर रात को 7 बजे तक उपलब्ध है जिसका किराया 143 रुपये है | 
बहुत सारी प्राइवेट बस सेवा भी उपलब्ध हैं जिनका किराया 250 रुपये से लेकर 750 रुपये तक है |
हवाई मार्ग द्वारा :-
विदेशी पर्यटकों के लिए हरिद्वार का निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट हवाई अड्डा देहरादून में है जो कि दिल्ली और देश के अन्य मुख्य हवाई अड्डों से जुड़ा हुआ है इसकी हरिद्वार से दूरी मात्र 34 किलोमीटर है और देहरादून के लिए दिल्ली से सप्ताह में चार उड़ानें होती हैं जेट लाइट और स्पाइस जेट द्वारा और इसका किराया लगभग 1000 रुपये है |
अपनी गाड़ी द्वारा :-
बहुत सारे लोग एकादशी,अमावस्या और पूर्णमाशी के लिए हर महीने हरिद्वार जाते हैं इसलिए सुविधा अनुसार अपनी गाड़ी उठाते हैं और चल देते हैं |  
जलवायु :---
तापमान
ग्रीष्मकाल: 15 डिग्री से- 42 डिग्री तक 

शीतकाल: 6 डिग्री से- 16.6 डिग्री तक
ठहरने के स्थान :---
यहां उत्तरांचल सरकार ने पर्यटकों के लिए आवास गृह बनाए हैं। पर्यटक अपने बजट के हिसाब से ठहरने के स्थान का चयन कर सकते हैं। यहाँ लगभग हर धर्म हर प्रान्त की धर्मशाला हैं , बहुत होटल भी उपलब्ध हैं किसी भी धर्मशाला में आप अपने पहचान के आधार पर रह सकते हैं | लगभग सभी धर्मशालाओं में खाने की व्यवस्था रहती है इसलिए आपको घर जैसा खाना मिल जाता है |

वैसे तो हरिद्वार की बहुत बार यात्रा की है लेकिन सेवा भारती के साथ जाने का यह पहला अवसर था | सेवा भारती वर्ष में दो बार अपने शिक्षिकों निरीक्षकों एवं अन्य सदस्यों को यात्रा पर लेकर जाता है जिसमें शिविर या अभ्यास वर्ग भी लगाया जाता है पर इस बार की यात्रा एक स्वतंत्र यात्रा के रूप में थी | सेवा भारती के साथ हरिद्वार का कार्यक्रम पूर्व नियोजित था इसलिए हमारी जनशताब्दी देहरादून से आने जाने की टिकटें पहले से बुक कर ली गई थीं | 13 जून को हमारा जाना और 16 जून को हमारी वापिसी निश्चित की गई थी |

सेवा भारती :---
सेवा भारती वैसे तो किसी परिचय का मोहताज नहीं परन्तु जिनका कभी इससे परिचय नहीं हुआ तो उनके लिए इतना कहना है कि यह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा चालित एक प्रकल्प है जो मुख्यतः बनवासी क्षेत्रों में कार्य करता है | पूरे देश में इसके लगभग एक लाख से ज्यादा केंद्र कार्यरत हैं |
मुख्य कार्य :--- इसके मुख्य कार्य शिक्षा, संस्कार, सामाजिक जागरूकता, धर्म-परिवर्तन से वनवासियों की रक्षा आदि हैं | इसमें मुख्यता बाल संस्कार , महिलाओं के लिए सौन्दर्य प्रसाधन की शिक्षा ,सिलाई की शिक्षा एवं कंप्यूटर की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है | 
पहला दिन 
हम कुल 105 लोग थे जिसमें पश्चिमी जिले के छः विभाग के कार्यकर्त्ता ही सम्मलित थे | सबको अपने आप नई दिल्ली स्टेशन पर पहुंचना था | हमारी गाड़ी का चलने का समय था दोपहर 3.25 का इसलिए इस भीषण गर्मी से पार पाने के लिए घर से रिक्शा कर मेट्रो लेना ही उचित समझा ठीक 2.14 बजे हम मेट्रो में बैठ चुके थे .....
राजीव चौक से येलो लाइन बदल कर एक स्टेशन बाद ही हम नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर 2.45 पर पहुंचे | यहाँ से बाहर निकल कर हमने प्लेटफोर्म संख्या 11 का रुख किया यहाँ पर हमारी गाड़ी जन शताब्दी लग चुकी थी ,पर यहाँ की अव्यवस्था ,बहुत सारी सीडियां और कोई भी लिफ्ट ना होने के कारण हम 3.14 पर ही गाड़ी के अन्दर पहुँच पाए | इतने में हम पसीने से लथपथ हो चुके थे जिसे सूखने में काफी देर लगी गाड़ी अपने निर्धारित समय पर चल चुकी थी | 
          हम सब अपनी अपनी सीट पर बैठ चुके थे | गाड़ी वाताअनुकूलित नहीं थी इसलिए काफी गर्मी रही पर बातों में सफ़र कट गया पता ही नहीं चला गाड़ी का पहुँचने का समय था शाम 7.35 पर ,लेकिन 45 मिनट की देरी से पहुंची यानि 8.14 पर | 
हम हरिद्वार स्टेशन पर उतर चुके थे और यहाँ की जो सबसे अच्छी बात रही वोह यह की यहाँ पर कोई सीढ़ी ना होकर केवल स्लाइड ही थी जिससे सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को और सबको ही उतरने में बहुत सुविधा रही | प्लेटफॉर्म से बाहर निकलते ही स्टेशन के बरामदों में और बाहर भी नजारा कुछ इस तरह था सब ने अपना रैन बसेरा बना रखा था और जमीन पर चादरें बिछा कर आराम से सो रहे थे |





जब सभी इक्कट्ठे हो गए तो स्टेशन से बाहर निकल धर्मशाला तक जाने का कार्यक्रम शुरू हुआ | कुछ ऑटो जिसमें सात सीट होती हैं वहीँ पर सात सात लोगों को लेकर धर्मशाला पहुँचने लगे जिसका हरेक को 30 रुपये किराया देना था | 
हमारी धर्मशाला दूधाधारी मंदिर के सामने आश्रम बाबा जोध सचियार जोकि ऋषिकेश जाने वाले प्रमुख मार्ग पर स्थित थी जिसमें सेवा भारती द्वारा पहले से व्यवस्था की गई थी | 



सबको कमरे मिल जाने के बाद सबने सामान रखा और पहुँच गए भोजनशाला में यहाँ खाने की व्यवस्था की गई थी |
भोजन के बाद सभी अपने अपने कमरे में सोने के लिए चले गए |

हरिद्वार यात्रा भाग 2.क्रमशः.....

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

गढ़ मुक्तेश्वर

कार्तिक का महीना एक पवित्र महीना माना जाता है जिसमें गंगा स्नान का विशेष महत्व रहा है | 12 नवम्बर का दिन हमने भी चुना इस बार गढ़ मुक्तेश्वर जाने के लिए | अपनी ही गाड़ी में हमने जाने का फैसला किया | लगभग 9 बजे हम निकल पड़े घर से ,फिर पटेल नगर से बाकी सदस्यों को लेते हुए हम 9.30 बजे वहाँ से रवाना हो गए अपने नये गंतव्य गढ़ मुक्तेश्वर की ओर | 





परिचय एवं स्थिति :---
गढ़मुक्तेश्वर भारत के उत्तरप्रदेश राज्य के हापुड़ जिले का शहर है। इसे गढवाल जाटों ने बसाया था। गंगा नदी के किनारे बसा यह शहर गढवाल राजाओं की राजधानी था। बाद में पृथ्वीराज चौहान ने हड़प लिया। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सौ किलोमीटर दूर 'राष्ट्रीय राजमार्ग 24' पर 'गढ़मुक्तेश्वर' नामक नगर बसा है जो हापुड़ ज़िले का एक तहसील मुख्यालय है। गढ़मुक्तेश्वर मेरठ से 42 किलोमीटर दूर स्थित है और गंगा नदी के दाहिने किनारे पर बसा है। विकास की दृष्टि से गढ़मुक्तेश्वर सबसे पिछड़ी तहसील मानी जाती है, किंतु सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यहाँ कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला गंगा स्नान पर्व उत्तर भारत का सबसे बड़ा मेला माना जाता है।


Garhmukteshwar is located in Uttar Pradesh

दिल्ली से इसकी दूरी लगभग 85 किलोमीटर है ,क्योंकि सुबह का समय था तो इतनी भीड़ नहीं थी और हमने खाना गाड़ी में ही रख लिया था इसलिए जल्दी से हम बढते जा रहे थे | किसी अच्छे ढाबे जा होटल की तलाश करते करते हम तीन घंटे में वहाँ पहुँच गए थे |

कैसे पहुंचें :---
सड़क मार्ग से :-
दिल्ली से यहां की दूरी लगभग 85 किलोमीटर है। उत्तर प्रदेश रोडवेज की नियमित बसें 'आनन्द विहार बस अड्डा, दिल्ली से चलती हैं।
रेल मार्ग से :-
यहाँ दो रेलवे स्टेशन हैं गढ़मुक्तेश्वर सिटी और बृजघाट रेलवे स्टेशन |
बृजघाट रेलवे स्टेशन यहां से 6 किलोमीटर की दूरी पर है। यह दिल्ली मुरादाबाद रूट पर पड़ता है | यह बड़े बड़े शहरों जैसे लखनऊ ,इलाहाबाद ,रोहतक ,सहारनपुर ,मुज्जफरपुर से जुदा हुआ है | 
अपनी गाड़ी :-
यह विकल्प तो है ही हमेशा अपने अनुसार चलने के लिए |

निवास :---
यहाँ पर कुछ अच्छे होटल हैं जो हाईवे पर हैं और सभी जरुरी सुविधायों से सुसज्जित हैं जैसे राही टूरिस्ट बंगलो ,होटल क्रिस्टल पैलेस, राजमहल होटल,होटल कृष्णा सागर आदि लेकिन घाट के पास कोई भी अच्छा निवास अच्छी सुविधाओं के साथ उपलब्ध नहीं है |

पौराणिक महत्त्व :---
भागवत पुराण व महाभारत के अनुसार यह कुरु की राजधानी हस्तिनापुर का भाग था। आज पर्यटकों को यहां की ऐतिहासिकता और आध्यात्मिकता के साथ-साथ प्राकृतिक ख़ूबसूरती भी खूब लुभाती है। मुक्तेश्वर शिव का एक मन्दिर और प्राचीन शिवलिंग कारखण्डेश्वर यहीं पर स्थित है। काशी, प्रयाग, अयोध्या आदि तीर्थों की तरह 'गढ़मुक्तेश्वर' भी पुराण उल्लिखित तीर्थ है। शिवपुराण के अनुसार 'गढ़मुक्तेश्वर' का प्राचीन नाम 'शिववल्लभ' (शिव का प्रिय) है, किन्तु यहां भगवान मुक्तीश्वर (शिव) के दर्शन करने से अभिशप्त शिवगणों की पिशाच योनि से मुक्ति हुई थी, इसलिए इस तीर्थ का नाम 'गढ़मुक्तीश्वर' (गणों की मुक्ति करने वाले ईश्वर) विख्यात हो गया। 

कथा :---
शिवगणों की शापमुक्ति की संक्षिप्त कथा इस प्रकार है- प्राचीन समय की बात है क्रोधमूर्ति महर्षि दुर्वासा मंदराचल पर्वत की गुफा में तपस्या कर रहे थे। भगवान शंकर के गण घूमते हुए वहां पहुंच गये। गणों ने तपस्यारत महर्षि का कुछ उपहास कर दिया। उससे कुपित होकर दुर्वासा ने गणों को पिशाच होने का शाप दे दिया। कठोर शाप को सुनते ही शिवगण व्याकुल होकर महर्षि के चरणों पर गिर पड़े और प्रार्थना करने लगे। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उनसे कहा - हे शिवगणो! तुम हस्तिनापुर के निकट खाण्डव वन में स्थित 'शिववल्लभ' क्षेत्र में जाकर तपस्या करो तो तुम भगवान आशुतोष की कृपा से पिशाच योनि से मुक्त हो जाओगे। पिशाच बने शिवगणों ने शिववल्लभ क्षेत्र में आकर कार्तिक पूर्णिमा तक तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन उन्हें दर्शन दिए और पिशाच योनि से मुक्त कर दिया। तब से शिववल्लभ क्षेत्र का नाम 'गणमुक्तीश्वर' पड़ गया। बाद में 'गणमुक्तीश्वर' का अपभ्रंश 'गढ़मुक्तेश्वर' हो गया। गणमुक्तीश्वर का प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर आज भी इस कथा का साक्षी है।

यहाँ पहुँचने के बाद हमने गाड़ी घाट की तरफ ले जानी चाही क्योंकि घाट तक जाने के लिए पैदल चलना पड़ता और पार्किंग काफी दूर थी हाई वे के बाई तरफ यहाँ कुछ गेस्ट हाउस वगेरह भी थे तो वहाँ पुलिस वाले खड़े थे अवरोध लगाकर उन्होंने गाड़ी अन्दर ले जाने के लिए रोका फिर वोही हुआ गाड़ी एक साइड खड़ी करके आए और उससे बात करके गए तब उसने गाड़ी ले जाने दी क्योंकि उसकी मुट्ठी गरम कर दी गई थी मात्र सौ रुपये देकर |
वहाँ पहुंचकर हमने घाट के नजदीक कोई होटल या गेस्ट हाउस वगेरह ढूंडना चाहा एक ही गेस्ट हाउस मिला वो भी इतना गन्दा था की हमने उसे ना लेने का निर्णय बनाया क्योंकि हमें सिर्फ कपड़े वगेरह बदलने के लिए ही इसकी जरुरत थी |वैसे घाट के पास बहुत सारी फानूस की बनी हुई झोंपड़ीयां हैं जो किराये पर मिलती हैं जैसा की चित्रों में दिखाया गया है |



क्योंकि कार्तिक माह चल रहा था इसलिए काफी स्त्रियाँ हवन यज्ञ में व्यस्त नज़र आईं | सब मिलकर हवन कर रहीं थी |




हमने घाट के उस पार जाकर नहाने का मन बनाया |हम घाट की तरफ बढ़ गए और नाव वाले से पूरी नाव दूसरे पार ले जाने का मूल्य पूछा जबकि एक सवारी का मूल्य 40 रुपये लिखा हुआ था और हम कुल 6 लोग थे  हमने उससे 200 रुपये में बात करली | उस पार पहुँचने के लिए रास्ते में ज्यादा पानी नहीं था कभी कभी नाव ले जाने वाला उतरकर पानी में खड़ा हो जाता नाव को ठेलने के लिए | और वो हमें उस पार छोड़ आया | 



यहाँ पर बहुत सारे तख्तपोश लगे हुए हैं जिस पर आप सामान रख सकते हैं बैठ सकते हैं खाना खा सकते हैं |यहाँ पहुंचकर हमने जूते वगेरह उतारकर एक तख्तपोश पर सारा सामान रख दिया | जो नहाने के इच्छुक थे वो नहाने के लिए चल पड़े | हमने स्नान किया आराम से क्योंकि पानी ना तो गहरा था ना ही उसमें बहाव था |




उसके बाद एक फानूस के पत्तों से बने कमरे में जिसमें साड़ी या दुपट्टे का पर्दा लगा था  उसमें जाकर कपड़े बदले  |
तब तक खाने की इच्छा प्रबल हो चुकी थी हमने खाना जो साथ लेकर आए थे वो खोला और पूरी पिकनिक की तरह उसका आनंद उठाया |



पेट पूजा होने तक नाव दोबारा हमें लेने पहुँच चुकी थी हमने वहीँ पूजा की और नाव में बैठकर वापिस उसी किनारे पहुँच गए |




गंगा मेला :---
इसी महत्व के कारण यहां प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक एक पखवाडे का विशाल मेला लगता है, जिसमें दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब आदि राज्यों से लाखों श्रद्धालु मेले में आते हैं और पतित पावनी गंगा में स्नान कर भगवान 'गणमुक्तीश्वर' पर गंगाजल चढ़ाकर पुण्यार्जन करते हैं।

धार्मिक कृत्य :---
यहां 'मुक्तीश्वर महादेव' के सामने पितरों को पिंडदान और तर्पण (जल-दान) करने से गया श्राद्ध करने की जरूरत नहीं रहती। पांडवों ने महाभारत के युद्ध में मारे गये असंख्य वीरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान यहीं मुक्तीश्वरनाथ के मंदिर के परिसर में किया था। यहां कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को पितरों की शांति के लिए दीपदान करने की परम्परा भी रही है सो पांडवों ने भी अपने पितरों की आत्मशांति के लिए मंदिर के समीप गंगा में दीपदान किया था तथा कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक यज्ञ किया था। तभी से यहां कार्तिक पूर्णिमा पर मेला लगना प्रारंभ हुआ। कार्तिक पूर्णिमा पर अन्य नगरों में भी मेले लगते हैं, किन्तु गढ़मुक्तेश्वर का मेला उत्तर भारत का सबसे बड़ा मेला माना जाता है।

व्यापार :---
यह गंगा के जल मार्ग से व्यापार का मुख्य केन्द्र था। उन दिनों यहां इमारती लकड़ी, बांस आदि का व्यापार होता था, जिसका आयात दून और गढ़वाल से किया जाता था। इसके साथ ही यहां गुड़ - गन्ने की बड़ी मंडी थी। यहां का मूढा़ उद्योग भी अति प्राचीन है। यहां के बने मूढे़ कई देशों में निर्यात किए जाते रहे हैं।

साक्षरता एवं भाषा :--- 
यहाँ की कुल जनसंख्या 60,000 के लगभग है |यहाँ पर साक्षरता रेट 82 % है जोकि राष्ट्रीय साक्षरता रेट से भी अधिक है जोकि 74% है | इसमें पुरुषों का प्रतिशत अधिक है | यहाँ की भाषा हिंदी है |
यहाँ आकर उनका रहन सहन देखकर आपको नहीं लगता की आप किसी पढे लिखे राज्य में आए हैं जबकि यहाँ पर बहुत सारे स्कूल और कॉलेज हैं| 

जलवायु :---
यहाँ की जलवायु गर्मिओं में बहुत गरम और सर्दिओं में बहुत सर्द रहती है ,अप्रैल से जून तक यहाँ खूब गर्मी पड़ती है और जून से सितम्बर मध्य तक बरसात और अक्तूबर से मार्च तक खूब सर्दी होती है |

दर्शनीय स्थल :---
गढ़मुक्तेश्वर में गंगा किनारे स्थित देवी गंगा को समर्पित मुक्तेश्वर महादेव मंदिर, गंगा मंदिर, मीराबाई की रेती, गुदडी़ मेला, बृज घाट, झारखंडेश्वर महादेव, कल्याणेश्वर महादेव का मंदिर आदि दर्शनीय स्थल हैं। 
मुक्तेश्वर महादेव मंदिर :-
यह मंदिर गढ़मुक्तेश्वर के प्राचीन शिव मंदिरों में से है |ऐसा माना जाता है की यह मंदिर राजा शिवि ने बनाया था |इस मंदिर में शिव लिंग स्थापित है जोकि संत परशुराम ने बनाया था ऐसा कहा जाता है |

None

गंगा मंदिर :-
गंगा मंदिर एक प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है इसमें 101 सीड़ियाँ बनी हुई थी जोकि गनगा में उअतारती हैं ,उसमें से 85 अभी  हैं | ब्रह्मा की सफ़ेद पत्थर से बनी मूर्ति देखने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से यात्री आते हैं नहुष कूप :-
मंदिर में राजा नहुष द्वारा यज्ञ किया गया और यहाँ एक कूप का भी निर्माण किया गया जिसमें पानी की पूर्ति गंगा के पानी से होती है | इसलिए इसे नहुष कूप कहा जाता है |

None

मीरा बाई की रेती :-
मुकतेश्वर मंदिर के बिल्कुल कुल सामने मीरा बाई की रेती के नाम से जाना जाने वाला दर्शनीय स्थल है यहाँ पूरे रेत ही फैली हुई है ऐसा कहा जाता है की यहाँ पर मीरा बाई ने भक्ति की थी |यह एक सुन्दर मंदिर है |

None

बृजघाट :-
बृजघाट एक सुन्दर दर्शनीय स्थल है | यहाँ वेदांत मंदिर, अमृत परिसर हनुमान मंदिर जैसे बहुत सारे मंदिर हैं |गंगा घाट सबसे सुन्दर घाट है |
कल्पवृक्ष :-
यह एक दिव्य वृक्ष है जो वेदांत मंदिर में विजयमल बघेल ने लगाया था |इसका धार्मिक ,आध्यात्मिक एवं औषधीय महत्व है |यह एक दुर्लभ जाति का पौधा है | 
घाट से वापिस लौटते हुए हमने बाजार का एक चक्कर लगाया यहाँ कुछ ऐसा नहीं था जो ख़रीदा जा सके | कोई भी ऐसा साफ़ सुथरा रेसटोरेंट नहीं था यहाँ खाना खाया जा सके इसलिए अपना खाना साथ ले जाना ना भूलें |
वापिस गाड़ी में बैठ जब निकलने लगे तो भिखारिओं को कुछ पैसे दे रहे थे तो एक भिखारी को ज्यादा ही लाचार जान जब उसे 100 रुपये देने की कोशिश की तो उसने लेने से इनकार कर दिया यह कहकर बाबूजी मैं इतने संभाल नहीं पायूँगा ,फिर उसे खुले पैसे कहीं से लेकर 10 रुपये दिए उस भिखारी के लिए सब नतमस्तक हो गए ,यह सोचते हुए कि दुनिया में ईमानदारी अभी भी कायम है |
इसके बाद हम वापिस दिल्ली के लिए निकल पड़े समय हो गया था 4 बजे का | धार्मिकता से ओतप्रोत हो थके हुए ठीक तीन घंटे में हम अपने घर पहुँच चुके थे | 

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

मकरसक्रांति

भारत विभिन्न ऋतुओं और त्योहारों का देश है प्रत्येक ऋतू परिवर्तन पर कोई न कोई त्योहार मनाया जाता है जिसका कोई न कोई वैज्ञानिक महत्व है और प्रकृति से भी इनका गहरा सम्बन्ध रहा है | 
त्योहार सामाजिक बंधनों को प्रगाढ़ बनाने का एक माध्यम है। यह एक बहाना है अपनों से मिलने का, लड़ाई-झगड़ा भूलाकर एक होने का और ईश्वर की आराधना का। 
संक्रांति का अर्थ:---
'संक्रान्ति' का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना, अत: वह राशि जिसमें सूर्य प्रवेश करता है, संक्रान्ति की संज्ञा से विख्यात है। राशियाँ बारह हैं, यथा मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक , धनु, मकर, कुम्भ, मीन। इसी तरह वर्ष भर की 12 संक्रान्तियाँ चार श्रेणियों में विभक्त हैं-
दो अयन संक्रान्तियाँ- मकर संक्रान्ति, जब उत्तरायण का आरम्भ होता है एवं कर्कट संक्रान्ति, जब दक्षिणायन का आरम्भ होता है।
दो विषुव संक्रान्तियाँ अर्थात मेष एवं तुला संक्रान्तियाँ, जब रात्रि एवं दिन बराबर होते हैं।
वे चार संक्रान्तियाँ, जिन्हें षडयीतिमुख अर्थात् मिथुन, कन्या, धनु एवं मीन कहा जाता है तथा
विष्णुपदी या विष्णुपद अर्थात् वृषभ, सिंह, वृश्चिक एवं कुम्भ नामक संक्रान्तियाँ।
औपनिषदिक ग्रंथों में उत्तरायण के छ: मासों का उल्लेख है इसमें 'अयन' शब्द आया है, जिसका अर्थ है 'मार्ग' या 'स्थल। गृह्यसूत्रों में 'उदगयन' उत्तरायण का ही द्योतक है, जहाँ स्पष्ट रूप से उत्तरायण आदि कालों में संस्कारों के करने की विधि वर्णित है। 
मकर सक्रांति:---
मकर सक्रांति भी एक प्रमुख त्यौहार है यह पर्व प्रत्येक वर्ष जनवरी के महीने में समस्त भारत में मनाया जाता है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होता है, जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। परम्परा से यह विश्वास किया जाता है कि इसी दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। यह वैदिक उत्सव है।  इस त्यौहार का सम्बन्ध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है। ये तीनों चीज़ें ही जीवन का आधार हैं। प्रकृति के कारक के तौर पर इस पर्व में सूर्य देव को पूजा जाता है, जिन्हें शास्त्रों में भौतिक एवं अभौतिक तत्वों की आत्मा कहा गया है। इन्हीं की स्थिति के अनुसार ऋतु परिवर्तन होता है और धरती अनाज उत्पन्न करती है, जिससे जीव समुदाय का भरण-पोषण होता है। यह एक अति महत्त्वपूर्ण धार्मिक कृत्य एवं उत्सव है। 
सूर्य पूर्व दिशा से उदित होकर 6 महीने दक्षिण दिशा की ओर से तथा 6 महीने उत्तर दिशा की ओर से होकर पश्चिम दिशा में अस्त होता है। 
उत्तरायण का समय देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन का समय देवताओं की रात्रि होती है, वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा गया है। मकर संक्रांति के बाद माघ मास में उत्तरायण में सभी शुभ कार्य किए जाते हैं।
ऐसा मानना है कि इस दिन के बाद हर दिन तिल तिल बढता है इसलिए इसे तिल सक्रांति भी कहते हैं |
कुछ मान्यताओं अनुसार देश भर में लोग मकर संक्रांति के पर्व पर अलग-अलग रूपों में तिल, चावल, उड़द की दाल एवं गुड़ का सेवन करते हैं। इन सभी सामग्रियों में सबसे ज़्यादा महत्व तिल का दिया गया है। इस दिन कुछ अन्य चीज़ भले ही न खाई जाएँ, किन्तु किसी न किसी रूप में तिल अवश्य खाना चाहिए। इस दिन तिल के महत्व के कारण मकर संक्रांति पर्व को "तिल संक्राति" के नाम से भी पुकारा जाता है। 
इसे खिचड़ी सक्रांति भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन खिचड़ी बनती और खिलाई जाती है |चावल व मूंग की दाल को पकाकर खिचड़ी बनाई जाती है। इस दिन खिचड़ी खाने का प्रचलन व विधान है। घी व मसालों में पकी खिचड़ी स्वादिष्ट, पाचक व ऊर्जा से भरपूर होती है। इस दिन से शरद ऋतु क्षीण होने लगती है |मकर सक्रान्ति से मौसम बदलता है। जब भी मौसम बदले, मन व स्वास्थ्य की दृष्टि से खानपान में संयम जरूरी होता है। वर्षा से सर्दी आने पर पहले श्राद्ध का संयम और फिर नवरात्र के उपवास। इधर पौष की शांति और फिर मकर सक्रान्ति को खानपान की सादगी। सर्दी से गर्मी ऋतु परिवर्तन का महीना चैत्र का खरवास फिर रामनवमी। इनके बहाने ये संयम कायम रखने का प्रावधान है। न सिर्फ शारीरिक संयम बल्कि मानसिक संयम भी। ऐसे ही संयम सुनिश्चित करने के लिए कमोबेश इन्ही दिनों इस्लाम में रोजा और ईसाई धर्म में गुड फ्राइडे के दिन बनाये गये हैं है। विज्ञान धार्मिक आस्था में विभेद नहीं करता है। अलग-अलग धर्मिक आस्थायें अलग-अलग भूगोल में स्वरूप लेने के कारण थोड़ी भिन्न जरूर होती हैं, लेकिन इनका विज्ञान एक ही है|
मकर संक्रान्ति का धार्मिक महत्व:---
किवदंतियां है कि इस दिन भगवान सूर्य (भास्कर)  अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन को ही चुना था। इसी दिन को ही गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं।
भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायण के छह मास के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त हैं। 
इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है।
मकर सक्रांति का वैज्ञानिक महत्व :---
मकर सक्रान्ति के दिन लाखों लोगों द्वारा एक साथ स्नान से नदियों में होने वाले वाष्पन का वैज्ञानिक महत्व है। इस दिन से भारत में सूर्य के प्रभाव में अधिकता आनी शुरू होती है। सूर्य के प्रभाव में अधिकता का प्रारंभ और ठीक उसी समय नदियों में एक साथ वाष्पन की क्रिया एक-दूसरे के सहयोगी हैं। दोनों मौसम के तापमान को प्रभावित करते हैं। इससे ठीक एक दिन पहले एक साथ-समय पूरे पंजाब में लोहड़ी मनाते हैं। इन क्रियाओं के आपसी तालमेल का प्रभाव यह होता है कि उत्तर भारत के मैदानों में मकर सक्रान्ति से ठंड उतरनी शुरू हो जाती है। ध्यान देने की बात है कि इस ठंड की विदाई भी हम होली पर पूरे उत्तर भारत में एक खास मुहुर्त पर व्यापक अग्नि प्रज्वलन से करते हैं।
विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति:---
मकर संक्रान्ति भारत के भिन्न-भिन्न लोगों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थ रखती है। किन्तु सदा की भॉंति, नानाविधी उत्सवों को एक साथ पिरोने वाला एक सर्वमान्य सूत्र है, जो इस अवसर को अंकित करता है। यदि दीपावली ज्योति का पर्व है तो संक्रान्ति शस्य पर्व है, नई फ़सल का स्वागत करने तथा समृद्धि व सम्पन्नता के लिए प्रार्थना करने का एक अवसर है।
पंजाब में:-
मकर संक्रान्ति भारत के अन्य क्षेत्रों में भी धार्मिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। पंजाब में इसे 'लोहड़ी' कहते हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में नई फ़सल की कटाई के अवसर पर मनाया जाता है। पुरुष और स्त्रियाँ गाँव के चौक पर उत्सवाग्नि के चारों ओर परम्परागत वेशभूषा में लोकप्रिय नृत्य भांगड़ा का प्रदर्शन करते हैं। स्त्रियाँ इस अवसर पर अपनी हथेलियों और पाँवों पर आकर्षक आकृतियों में मेहंदी रचाती हैं।
बंगाल में:-
पश्चिम बंगाल में मकर सक्रांति के दिन देश भर के तीर्थयात्री गंगासागर द्वीप पर एकत्र होते हैं, जहाँ गंगा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। एक धार्मिक मेला, जिसे 'गंगासागर मेला' कहते हैं, इस समारोह की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस संगम पर डुबकी लगाने से सारा पाप धुल जाता है।
कर्नाटक में:-
कर्नाटक में भी फ़सल का त्योहार शान से मनाया जाता है। बैलों और गायों को सुसज्जित कर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है। नये परिधान में सजे नर-नारी, ईख, सूखा नारियल और भुने चने के साथ एक दूसरे का अभिवादन करते हैं। पंतगबाज़ी इस अवसर का लोकप्रिय परम्परागत खेल है।
गुजरात में:-
गुजरात का क्षितिज भी संक्रान्ति के अवसर पर रंगबिरंगी पंतगों से भर जाता है। 

गुजराती लोग संक्रान्ति को एक शुभ दिवस मानते हैं और इस अवसर पर छात्रों को छात्रवृतियाँ और पुरस्कार बाँटते हैं।
केरल में:-
केरल में भगवान अयप्पा की निवास स्थली सबरीमाला की वार्षिक तीर्थयात्रा की अवधि मकर संक्रान्ति के दिन ही समाप्त होती है, जब सुदूर पर्वतों के क्षितिज पर एक दिव्य आभा ‘मकर ज्योति’ दिखाई पड़ती है।
महाराष्ट्र में:-
इस दिन सभी पुराने गिले-शिकवे भूलाकर तिल-गुड़ से मुँह मीठा कर दोस्ती का एक नया रिश्ता कायम किया जाता है। समूचे महाराष्ट्र में इस त्योहार को रिश्तों की एक नई शुरुआत के रूप में मनाया जाता है।
मध्यप्रदेश में:- 
बचपन की यादें ताजा करने व दोस्तों के साथ फिर से हँसी-ठहाके करने का त्योहार मकर सक्रांति है। गिल्ली-डंडे के खेल के रूप में मौज-मस्ती के एक बहाने के रूप में म.प्र. में यह त्योहार मनाया जाता है। इस त्योहार पर परिवार के बच्चे से लेकर बूढ़े सभी एक साथ गिल्ली-डंडे के इस खेल का आनंद उठाते हैं। 
तमिलनाडु में:-
,'पोंगल` तमिल लोगो का सबसे बड़ा पर्व है | तमिल मे 'पोगु ' शब्द का अर्थ है उबलना कुछ दूसरी चीजो के साथ विशेष कर दूध मे उबाले गये चावल को तमिल मे 'पोंगल' कहते  है | इसलिये इस पर्व का नाम भी पोंगल पड़ा है 

'पोंगल' मुलता एक फसल सम्बन्धी त्यौहार है | खास तौर पर पोंगल के दिन पशुधन व घर के हर जानवर को साफ-स्वच्छ और स्नान कराया जाता है।  
पोंगल पर्व तीन दिन तक मनाया जाता है | तमिलनाडु में 'पोंगल' के रूप में इस त्योहार को मनाते हुए प्रकृति देवता का नमन किया जाता है।
असम में:-
माघ बिहू के पहले दिन को उरुका कहा जाता है। इस दिन लोग नदी के किनारे अथवा खुली जगह में धान की पुआल से अस्थाई छावनी बनाते हैं जिसे भेलाघर कहते हैं। 

गांव के सभी लोग यहां रात्रिभोज करते हैं। इस छावनी के पास ही चार बांस लगाकर उस पर पुआल एवं लकड़ी से ऊंचे गुम्बज का निर्माण करते हैं जिसे मेजी कहते हैं। उरुका के दूसरे दिन सुबह स्नान करके मेजी जलाकर माघ बिहू का शुभारंभ किया जाता है। गांव के सभी लोग इस मेजी के चारों और एकत्र होकर भगवान से मंगल की कामना करते हैं।

अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए लोग विभिन्न वस्तुएं भी मेजी में भेंट चढ़ाते हैं। मेजी की अधचली लकडिय़ों और भस्म को खेतों में छिड़का जाता है। मान्यता के अनुसार ऐसा करने से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। बिहू उत्सव के दौरान वहां के लोग अपनी खुशी का इजहार करने के लिए लोकनृत्य भी करते हैं।
मकर संक्रांति पर खान-पान:---
मकर सक्रांति पर सब प्रान्तों में कुछ मिलता जुलता ही खाना बनाया जाता है |

बिहार तथा उत्तर प्रदेश:-
बिहार एवं उत्तर प्रदेश में खान-पान लगभग एक जैसा होता है। दोनों ही प्रांत में इस दिन अगहनी धान से प्राप्त चावल और उड़द की दाल से खिचड़ी बनाई जाती है। कुल देवता को इसका भोग लगाया जाता है। लोग एक-दूसरे के घर खिचड़ी के साथ विभिन्न प्रकार के अन्य व्यंजनों का आदान-प्रदान करते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग मकर संक्राति को "खिचड़ी पर्व" के नाम से भी पुकारते हैं। इस प्रांत में मकर संक्राति के दिन लोग चूड़ा-दही, गुड़ एवं तिल के लड्डू भी खाते हैं। चूड़े एवं मुरमुरे की लाई भी बनाई जाती है।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़:-
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मकर संक्रांति के दिन बिहार और उत्तर प्रदेश की ही तरह खिचड़ी और तिल खाने की परम्परा है। यहाँ के लोग इस दिन गुजिया भी बनाते हैं।
दक्षिण भारत:-
दक्षिण भारतीय प्रांतों में मकर संक्राति के दिन गुड़, चावल एवं दाल से पोंगल बनाया जाता है। विभिन्न प्रकार की कच्ची सब्जियों को लेकर मिश्रित सब्ज़ी बनाई जाती है। इन्हें सूर्य देव को अर्पित करने के पश्चात सभी लोग प्रसाद रूप में इसे ग्रहण करते हैं। इस दिन गन्ना खाने की भी परम्परा है।
पंजाब एवं हरियाणा:-
पंजाब एवं हरियाणा में इस पर्व में विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में मक्के की रोटी एवं सरसों के साग को विशेष तौर पर शामिल किया जाता है। इस दिन पंजाब एवं हरियाणा के लोगों में तिलकूट, रेवड़ी और गजक खाने की भी परम्परा है। मक्के का लावा, मूँगफली एवं मिठाईयाँ भी लोग खाते हैं।

हर त्योहार हमारे लिए कुछ न कुछ संदेश लेकर आता है। मकर सक्रांति का त्योहार भी हमें भेदभाव भुलाकर एकजुट होने का संदेश देता है। तो क्यों न इस दिन हम सभी एक-दूसरे के साथ प्रेम, आत्मीयता व सम्मान का एक नया रिश्ता कायम करें।

सोमवार, 13 जनवरी 2014

'' लोहड़ी ''

लोहड़ी उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध त्योहार है। यह मकर संक्रान्ति के एक दिन पहले मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति की पूर्वसंध्या पर इस त्यौहार का उल्लास रहता है। विशेषतः पंजाब के लोगों के लिए लोहड़ी की महत्ता एक पर्व से भी अधिक है। पंजाबी लोग हंसी मज़ाक पसंद, तगड़े, ऊर्ज़ावान, जोशीले व स्वाभाविक रूप से हंसमुख होते हैं। 



परिचय:---
लोहड़ी पौष के अंतिम दिन, सूर्यास्त के बाद (माघ संक्रांति से पहली रात) यह पर्व मनाया जाता है। यह प्राय: १२ या १३ जनवरी को पड़ता है। यह मुख्यत: पंजाब का पर्व है, यह द्योतार्थक (एक्रॉस्टिक) शब्द लोहड़ी की पूजा के समय व्यवहृत होने वाली वस्तुओं के द्योतक वर्णों का समुच्चय जान पड़ता है, जिसमें ल (लकड़ी) +ओह (गोहा = सूखे उपले) +ड़ी (रेवड़ी) = 'लोहड़ी' के प्रतीक हैं। श्वतुर्यज्ञ का अनुष्ठान मकर संक्रांति पर होता था, संभवत: लोहड़ी उसी का अवशेष है। पूस-माघ की कड़कड़ाती सर्दी से बचने के लिए आग भी सहायक सिद्ध होती है-यही व्यावहारिक आवश्यकता 'लोहड़ी' को मौसमी पर्व का स्थान देती है।
लोहड़ी की लोककथायें:---
लोहड़ी से संबद्ध परंपराओं एवं रीति-रिवाजों से ज्ञात होता है कि प्रागैतिहासिक गाथाएँ भी इससे जुड़ गई हैं। एक प्रचलित लोककथा है कि मकर संक्रान्ति के दिन कंस ने कृष्ण को मारने के लिए लोहिता नामक राक्षसी को गोकुल में भेजा था, जिसे कृष्ण ने खेल–खेल में ही मार डाला था। उसी घटना की स्मृति में लोहिता का पावन पर्व मनाया जाता है। 
सिन्धी समाज में भी मकर संक्रान्ति से एक दिन पूर्व 'लाल लाही' के रूप में इस पर्व को मनाया जाता है।
दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में ही यह अग्नि जलाई जाती है। 
लोहड़ी को दुल्ला भट्टी की एक कहानी से भी जोड़ा जाता हैं। दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था। उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को ग़ुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न केवल मुक्त ही करवाया बल्कि उनकी शादी भी हिन्दू लड़कों से करवाई और उनके शादी की सभी व्यवस्था भी करवाई। दुल्ला भट्टी एक विद्रोही था और जिसकी वंशावली भट्टी राजपूत थे। उसके पूर्वज पिंडी भट्टियों के शासक थे जो कि संदल बार में था। अब संदल बार पाकिस्तान में स्थित हैं। वह सभी पंजाबियों का नायक था।
यह भी कहा जाता है कि संत कबीर की पत्नी लोई की याद में यह पर्व मनाया जाता है. इसीलिए इसे लोई भी कहा जाता है। 
अग्नि का पूजन:---
जैसे होली जलाते हैं, उसी तरह लोहड़ी की संध्या पर होली की तरह लकड़ियाँ एकत्रित करके जलायी जाती हैं और तिलों से अग्नि का पूजन किया जाता है। इस त्योहार पर बच्चों के द्वारा घर–घर जाकर लकड़ियाँ एकत्र करने का ढंग बड़ा ही रोचक है। बच्चों की टोलियाँ लोहड़ी गाती हैं, और घर–घर से लकड़ियाँ माँगी जाती हैं। वे एक गीत गाते हैं, जो कि बहुत प्रसिद्ध है —
सुंदर मुंदरिये ! ..................हो
तेरा कौन बेचारा, .................हो
दुल्ला भट्टी वाला, ...............हो
दुल्ले घी व्याही, ..................हो
सेर शक्कर आई, .................हो
कुड़ी दे बाझे पाई, .................हो
कुड़ी दा लाल पटारा, ...............हो
यह गीत गाकर दुल्ला भट्टी की याद करते हैं।





रीति रिवाज :---
पंजाब में लोहड़ी पर विशेषतया शादीशुदा लड़किओं को तिल पट्टी ,मूंगफली ,मक्के के दाने मिष्ठान फल वगेरह और कपड़े आदि उपहार स्वरुप दिए जाते हैं 
जिन परिवारों में लड़के का विवाह होता है अथवा जिन्हें पुत्र प्राप्ति होती है, उनसे पैसे लेकर मुहल्ले या गाँव भर में बच्चे ही बराबर बराबर रेवड़ी बाँटते हैं। लोहड़ी के दिन या उससे दो चार दिन पूर्व बालक बालिकाएँ बाजारों में दुकानदारों तथा पथिकों से 'मोहमाया' या महामाई (लोहड़ी का ही दूसरा नाम) के पैसे माँगते हैं, इनसे लकड़ी एवं रेवड़ी खरीदकर सामूहिक लोहड़ी में प्रयुक्त करते हैं।
शहरों के शरारती लड़के दूसरे मुहल्लों में जाकर 'लोहड़ी' से जलती हुई लकड़ी उठाकर अपने मुहल्ले की लोहड़ी में डाल देते हैं। यह 'लोहड़ी व्याहना' कहलाता है। 
आजकल इस त्यौहार ने एक बड़ा स्वरूप ले लिया है पार्टिओं का दौर चल पड़ा है जिनकी पहली शादी होती है या पहली संतान के रूप में भी इस त्यौहार को मनाने के लिए सबको निमंत्रण भेजकर खूब धूम ह्दाम से इसे मनाते हैं| 
मान्यताएँ :---
लोहड़ी त्यौहार की उत्पत्ति के बारे में काफी मान्यताएं हैं जो की पंजाब के त्यौहार से जुडी हुई मानी जाती हैं। कई लोगो का मानना हैं की यह त्यौहार जाड़े की ऋतू के आने का द्योतक के रूप में मनाया जाता हैं। 
इस दिन शीत ऋतु अपनी चरम सीमा पर होती है। तापमान शून्य से पाँच डिग्री सेल्सियस तक होता है तथा घने कोहरे के बीच सब कुछ ठहरा सा प्रतीत होता है। लेकिन इस शीत ग्रस्त सतह के नीचे जोश की लहर महसूस की जा सकती है। विशेषकर हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश में लोग लोहड़ी की तैयारी बहुत ही ख़ास तरीके से करते हैं। आग के बड़े–बड़े अलाव कठिन परिश्रम के बाद बनते हैं। इन अलावों में जीवन की गर्म-जोशी छिपी रहती है। क्योंकि अब समय रबी (शीत) की फ़सल काटने का होता है। विश्राम व हर्ष की भावना को लोग रोक नहीं पाते हैं। लोहड़ी पौष मास की आख़िरी रात को मनायी जाती है। कहते हैं कि हमारे बुज़ुर्गों ने ठंड से बचने के लिए मंत्र भी पढ़ा था। इस मंत्र में सूर्यदेव से प्रार्थना की गई थी कि वह इस महीने में अपनी किरणों से पृथ्वी को इतना गर्म कर दें कि लोगों को पौष की ठंड से कोई भी नुक़सान न पहुँच सके। वे लोग इस मंत्र को पौष माह की आख़िरी रात को आग के सामने बैठकर बोलते थे कि सूरज ने उन्हें ठंड से बचा लिया। 
श्रीमद्भागवदगीता के अनुसार, श्रीकृष्ण ने अपना विराट व अत्यन्त ओजस्वी स्वरूप इसी काल में प्रकट किया था। हिन्दू इस अवसर पर गंगा में स्नान कर अपने सभी पाप त्यागते हैं। गंगासागर में इन दिनों स्नानार्थियों की अपार भीड़ उमड़ती है। उत्तरायणकाल की महत्ता का वर्णन हमारे शास्त्रकारों ने अनेक ग्रन्थों में किया है।
संगीत और भांगड़ा:---
जनवरी की तीखी सर्दी में जलते हुए अलाव अत्यन्त सुखदायी व मनोहारी लगते हैं। सभी लोग रंग-बिरंगे वस्त्रों में बन ठन के आते हैं। पुरुष पजामा व कुरता पहनते हैं। कुरते के ऊपर जैकेट पर शीशे के गोल विन्यास होते हैं। जिनके चारों ओर गोटा लगा होता है। इसी से मेल खाती बड़ी–बड़ी पगड़ियाँ होती हैं। सज–धजकर पुरुष अलाव के चारों ओर एकत्रित होकर भांगड़ा नृत्य करते हैं। चूँकि अग्नि ही इस पर्व के प्रमुख देवता हैं, इसलिए चिवड़ा, तिल, मेवा, गजक आदि की आहूति भी स्वयं अग्निदेव को चढ़ायी जाती है। भांगड़ा नृत्य आहूति के बाद ही प्रारम्भ होता है। नगाड़ों की ध्वनि के बीच यह नृत्य एक लड़ी की भाँति देर रात तक चलता रहता है तथा लगातार नए नृत्य समूह इसमें सम्मिलित होते हैं। पारम्परिक रूप से स्त्रियाँ भांगड़े में सम्मिलित नहीं होती हैं। वे अलग आँगन में अलाव जलाती हैं तथा सम्मोहक गिद्दा नृत्य प्रस्तुत करती हैं।





उत्सव प्रेम व हल्की छेड़–छाड़ तथा स्वच्छंदता ही लोहड़ी पर्व का प्रतीक है। आधुनिक समय में लोहड़ी का दिन लोगों को अपनी व्यस्तता से बाहर खींच लाता है। लोग एक-दूसरे से मिलकर अपना सुख-दुःख बाँटते हैं।
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